7 अक्टूबर को होने वाली RBI की Monetary Policy Committee की बैठक में रेपो रेट को **25 bps** बढ़ाकर **5.50%** करने के कयास लगाए जा रहे हैं। बढ़ती महंगाई और ग्लोबल दबाव के बीच निवेशकों की नजरें गवर्नर की गाइडेंस पर टिकी हैं।
रेपो रेट बढ़ने के पीछे की असली वजह
RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की तीन दिवसीय बैठक 7 अक्टूबर को खत्म हो रही है। जानकारों का मानना है कि रेपो रेट को मौजूदा 5.25% से बढ़ाकर 5.50% किया जा सकता है। हालांकि, बाजार ने इस बढ़ोतरी को पहले ही मान लिया है, लेकिन असली खेल RBI की 'कमेंट्री' का होगा कि आगे चलकर ब्याज दरों का रुख क्या रहने वाला है।
इस फैसले के पीछे सबसे बड़ी वजह महंगाई है। अगस्त महीने में रिटेल महंगाई 4.82% दर्ज की गई थी, जो लगातार तीन महीनों से RBI के कंफर्ट जोन से बाहर है। इसके अलावा, ब्रेंट क्रूड ऑयल ($100 प्रति बैरल) की कीमतें और वेस्ट एशिया में जारी तनाव ने स्थिति को जटिल बना दिया है, जिससे RBI का रुख 'हॉकिश' (Hawkish) रहने की उम्मीद है।
बाजार पर असर
पिछले 8 हफ्तों से भारतीय शेयर बाजार में लगातार गिरावट देखी जा रही है। बॉन्ड मार्केट में भी हलचल है, जहां 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड बढ़कर 7.23% के मल्टी-ईयर हाई के करीब पहुंच गई है। मार्केट अब इस डर में है कि ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती हैं, जिससे कंपनियों के मुनाफे और आम आदमी की EMI पर बुरा असर पड़ सकता है।
निवेशकों के लिए दो बड़े रिस्क हैं:
- कॉर्पोरेट कर्ज: ज्यादा कर्ज वाली कंपनियों का मुनाफा घट सकता है।
- कैपिटल शिफ्ट: बॉन्ड यील्ड बढ़ने से इक्विटी की तुलना में सरकारी बॉन्ड अधिक आकर्षक हो सकते हैं, जिससे मार्केट से पैसा निकल सकता है।
अब सबकी नजरें इस बात पर हैं कि RBI महंगाई और इकोनॉमिक ग्रोथ के बीच संतुलन कैसे बिठाता है।
