RBI की दोहरी रणनीति: ग्रोथ और मजबूती पर फोकस
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) अर्बन कोऑपरेटिव बैंक्स (UCBs) के लिए नियमों में बड़े बदलाव का प्रस्ताव लेकर आया है। यह एक दोहरी रणनीति है, जिसका मकसद UCBs के ज़रिए लोन के प्रवाह को बढ़ाना और साथ ही उनकी आंतरिक क्षमता व मजबूती को मज़बूत करना है। RBI ने अनसिक्योर्ड लोन की सीमा को दोगुना करने का प्रस्ताव दिया है, वहीं दूसरी ओर 'मिशन-SAKSHAM' जैसे प्रोग्राम से सेक्टर के 1.4 लाख से ज़्यादा कर्मचारियों को ट्रेनिंग देने की तैयारी है।
अनसिक्योर्ड लोन की सीमा में बड़ा इज़ाफा
प्रस्तावित बड़े बदलावों में से एक है UCBs के लिए अनसिक्योर्ड (असुरक्षित) लोन की कुल सीमा को मौजूदा 10% से बढ़ाकर 20% करना। इसके साथ ही, व्यक्तिगत लोन की सीमाएं भी बढ़ाई गई हैं: टियर 1 UCBs के लिए ₹5 लाख, टियर 2 के लिए ₹7.5 लाख, और टियर 3 व 4 के लिए ₹10 लाख। अगर योग्य प्रायोरिटी सेक्टर लोन की बात करें, तो 20% की सीमा से ऊपर भी अतिरिक्त अनसिक्योर्ड लोन दिए जा सकेंगे, जो प्रति उधारकर्ता ₹50,000 तक सीमित होंगे। कंज्यूमर ड्यूरेबल्स खरीदने वाले नॉमिनल सदस्यों के लिए भी लोन की सीमा ₹2.5 लाख प्रति उधारकर्ता तक बढ़ाने का प्रस्ताव है। ये बदलाव UCBs की लोन बांटने की क्षमता को बढ़ाएंगे और ज़्यादा लोगों की ज़रूरतों को पूरा कर पाएंगे।
होम लोन में राहत और क्षमता निर्माण पर ज़ोर
टियर-3 और टियर-4 UCBs के लिए होम लोन के टेन्योर (अवधि) और मोराटोरियम (ब्याज भुगतान में छूट) की शर्तों को डीरेग्युलेट (सरल) करने का भी प्रस्ताव है, जिससे इन बैंक्स को अपने बोर्ड से मंज़ूर की गई नीतियों के आधार पर होम लोन स्ट्रक्चर करने में ज़्यादा आज़ादी मिलेगी। इसके साथ ही, RBI 'मिशन-SAKSHAM' (सहकारी बैंक क्षमता निर्माण) नाम से एक बड़ा इनिशिएटिव शुरू कर रहा है। इसका लक्ष्य UCBs की प्रबंधकीय, तकनीकी और परिचालन क्षमता को मज़बूत करना है। इस प्रोग्राम के तहत 1.4 लाख से ज़्यादा UCB कर्मचारियों को फिजिकल और डिजिटल प्लेटफॉर्म के ज़रिए ट्रेनिंग दी जाएगी। यह कदम RBI के इस विश्वास को दर्शाता है कि लोन देने में आज़ादी के साथ-साथ मज़बूत आंतरिक नियंत्रण और विशेषज्ञता का होना भी ज़रूरी है।
सेक्टर का मौजूदा हाल और जोखिम
भारतीय बैंकिंग सेक्टर इस समय मज़बूत स्थिति में है, जहां GDP ग्रोथ 6.4% रहने का अनुमान है और क्रेडिट ग्रोथ 11-13% तक पहुंचने की उम्मीद है। ग्रॉस NPA 13 साल के निचले स्तर पर हैं। हालांकि, पूरे वित्तीय सिस्टम में अनसिक्योर्ड लोन का बड़ा हिस्सा बढ़ा है, जो रिटेल क्रेडिट का एक अहम हिस्सा बन गया है और इसमें डिफ़ॉल्ट का खतरा ज़्यादा है। स्मॉल फाइनेंस बैंक्स (SFBs) और यूनिवर्सल बैंक्स अलग रेगुलेटरी फ्रेमवर्क में काम करते हैं, लेकिन UCBs को ऐतिहासिक रूप से गवर्नेंस और NPA को लेकर बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। ऐसे में, RBI का अनसिक्योर्ड लोन की सीमा बढ़ाना, पूरे वित्तीय सिस्टम में बढ़ रही इस चिंता के बीच हो रहा है। UCBs का रेगुलेशन RBI और राज्य सहकारिता विभागों के बीच बंटा हुआ है, जिससे काम में अक्सर जटिलताएं आती हैं।
संभावित खतरे और आगे की राह
RBI की मंशा UCBs को मज़बूत करने की है, लेकिन अनसिक्योर्ड लोन की सीमा बढ़ने से क्रेडिट जोखिम बढ़ सकता है। अनसिक्योर्ड लोन में कोलेटरल (जमानत) नहीं होता, इसलिए आर्थिक मंदी या बढ़ती ब्याज दरों के दौर में इनके डिफॉल्ट होने का खतरा ज़्यादा होता है। ऐतिहासिक रूप से, UCBs में शेड्यूलड कमर्शियल बैंक्स की तुलना में NPA की प्रवृत्ति ज़्यादा रही है और कई बार इन्हें नियमों का पालन न करने पर दंड भी भुगतना पड़ा है। 'मिशन-SAKSHAM' से क्षमता बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह कितना प्रभावी ढंग से लागू होता है। कुछ UCBs में वित्तीय कुप्रबंधन और गवर्नेंस की गड़बड़ियों के पुराने मामले भी चिंता का विषय बने हुए हैं।
भविष्य का नज़रिया
RBI ने इन ड्राफ्ट नियमों पर 4 मार्च, 2026 तक जनता से राय मांगी है। यह एक सोची-समझी प्रक्रिया है ताकि अंतिम नियम लागू होने से पहले सभी पहलुओं पर विचार किया जा सके। ये प्रस्ताव वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने और जमीनी स्तर पर क्रेडिट प्रवाह को मज़बूत करने के लिए बनाए गए हैं। सहकारी बैंकिंग क्षेत्र को मज़बूत करने और इसे भारतीय वित्तीय इकोसिस्टम में एक बड़ी भूमिका निभाने में सक्षम बनाने का लक्ष्य है। इस रणनीति की सफलता लोन की आज़ादी को कड़े जोखिम प्रबंधन और निरंतर क्षमता विकास के साथ संतुलित करने पर निर्भर करेगी।