भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक बड़ा ऐलान करते हुए बैंकों के लिए सिक्युरिटाइजेशन नोट्स को 'डिमैट' यानी डीमैटेरियलाइज्ड फॉर्म में रखना अनिवार्य कर दिया है। इन निवेशों के लिए कम से कम **₹1 करोड़** का टिकट साइज पहले की तरह ही बना रहेगा। इस कदम का मकसद मार्केट में पारदर्शिता (transparency) लाना और प्रक्रियाओं को स्टैंडर्डाइज करना है।
Detailed Coverage
क्यों लाए जा रहे हैं ये नए नियम?
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने अपने सिक्युरिटाइजेशन ट्रांजेक्शन फ्रेमवर्क में ड्राफ्ट अमेंडमेंट जारी किए हैं। इसके तहत, अब सभी बैंकों को जारी किए जाने वाले सिक्युरिटाइजेशन नोट्स डीमैटेरियलाइज्ड (dematerialised) रूप में ही रखने होंगे। सेंट्रल बैंक का कहना है कि यह फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स को मॉडर्न बनाने और ट्रांजेक्शन की डिजिटल ट्रैकिंग को बेहतर बनाने की दिशा में एक अहम कदम है। फिजिकल सर्टिफिकेट्स से हटकर, रेगुलेटर का इरादा इन जटिल डेट इंस्ट्रूमेंट्स के ट्रांसफर प्रोसेस को आसान बनाना और मार्केट ट्रांसपेरेंसी को बढ़ाना है।
₹1 करोड़ की मिनिमम लिमिट पर कोई बदलाव नहीं
होल्डिंग के तरीके में बदलाव के बावजूद, RBI ने मिनिमम इन्वेस्टमेंट साइज, जिसे 'टिकट साइज' भी कहा जाता है, को ₹1 करोड़ पर बनाए रखने का फैसला किया है। यह नियम नए इश्यू और सेकेंडरी मार्केट में होने वाले ट्रांसफर, दोनों पर लागू होगा। RBI ने इस बात पर जोर दिया है कि यह लिमिट प्रति इन्वेस्टर है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि सिक्युरिटाइजेशन नोट्स मुख्य रूप से इंस्टीट्यूशनल या हाई-नेट-वर्थ इन्वेस्टर्स के लिए ही बने रहें, न कि रिटेल पब्लिक के लिए।
नई कम्प्लायंस रिक्वायरमेंट्स
इन नियमों के सख्त अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए, ड्राफ्ट गाइडलाइंस में यह प्रस्ताव है कि ओरिजिनेटर्स (यानी वे बैंक जो लोन को पूल करके सिक्युरिटाइजेशन करते हैं) और स्पेशल पर्पस एंटिटीज (SPEs) के बीच होने वाले एग्रीमेंट्स में एक मैंडेटरी कम्प्लायंस क्लॉज शामिल हो। यह क्लॉज कानूनी तौर पर दोनों पार्टियों को इंस्ट्रूमेंट की पूरी लाइफसाइकिल के दौरान ₹1 करोड़ के मिनिमम टिकट साइज को बनाए रखने के लिए बाध्य करेगा। इसका मकसद उन होल्डिंग्स को टूटने से रोकना है जो नोट्स को सब-डिवाइड या छोटी क्वांटिटीज में बेचने से हो सकती हैं।
SEBI के साथ तालमेल और लागू होने की समय-सीमा
इसके अलावा, RBI सिक्युरिटाइजेशन नोट्स के लिए 'पब्लिक ऑफर' की अपनी परिभाषा को सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) द्वारा निर्धारित मौजूदा रेगुलेशंस के साथ हार्मोनाइज करना चाहता है। खास तौर पर, यह प्रस्ताव SEBI (Issue and Listing of Securitised Debt Instruments and Security Receipts) Regulations, 2008 के साथ अलाइन होने का लक्ष्य रखता है। जब ऑफरिंग बड़े ग्रुप के पोटेंशियल इन्वेस्टर्स को की जाती है, तो इससे रेगुलेटरी ओवरसाइट में और स्पष्टता आएगी।
RBI ने इन ड्राफ्ट गाइडलाइंस पर 27 अगस्त, 2026 तक पब्लिक फीडबैक मांगा है। फाइनल होने के बाद, ये नियम 1 अक्टूबर, 2026 से लागू होने का प्रस्ताव है। यह समय-सीमा कमर्शियल बैंकों और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस को अपने सिस्टम को डीमैटेरियलाइज्ड इश्यूएंस को सपोर्ट करने के लिए अपडेट करने और यह सुनिश्चित करने का मौका देगी कि SPEs के साथ उनके लीगल एग्रीमेंट्स नए मैंडेटरी क्लॉज का पालन करें।
