विदेशी पूंजी के लिए एक रणनीतिक कदम
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए नियमों का ढांचा बाहरी अस्थिरता के बीच बाज़ार में लिक्विडिटी (liquidity) बढ़ाने की ओर एक बड़ा कदम है। अब नॉन-रेजिडेंट इंडियंस (NRIs), ओवरसीज सिटिजन्स ऑफ इंडिया (OCIs) और अन्य विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) में रजिस्ट्रेशन कराने की अनिवार्यता को खत्म कर दिया गया है। इससे रिटेल विदेशी निवेश में आ रही बड़ी बाधाएं दूर होंगी और ज़्यादा से ज़्यादा विदेशी निवेशक आसानी से भारतीय बाज़ारों में पैसा लगा पाएंगे।
डेट मार्केट में उदारीकरण और यील्ड (Yield) पर असर
सबसे बड़ा तकनीकी बदलाव Fully Accessible Route (FAR) का विस्तार है। RBI ने 15-साल, 30-साल और 40-साल की सरकारी सिक्योरिटीज को इस रूट में शामिल किया है। इसका मकसद सॉवरेन वेल्थ फंड्स और पेंशन फंड्स जैसे बड़े लॉन्ग-टर्म इंस्टीट्यूशनल निवेशकों को आकर्षित करना है। इसके साथ ही, सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) और बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (BIS) के लिए कैपिटल गेन्स (Capital Gains) और ब्याज आय पर लगने वाले टैक्स को खत्म कर दिया है। इससे सरकारी बॉन्ड मार्केट को मज़बूती मिलेगी और सरकारी उधारी आसान होगी।
जोखिमों पर एक नज़र
हालांकि, बाज़ार इन सुधारों को लिक्विडिटी के लिहाज़ से एक सकारात्मक कदम मान रहा है, लेकिन कुछ छिपे हुए जोखिम भी हैं। विदेशी पूंजी के आने-जाने में आसानी से वैश्विक झटकों का घरेलू बाज़ार पर असर तेज़ी से दिख सकता है। पहले भी जब विदेशी निवेशकों ने अचानक पैसा निकाला है, तो बाज़ार में भारी गिरावट आई है। इसके अलावा, फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) के लिए शॉर्ट-टर्म और कंसंट्रेशन लिमिट्स को हटाने से करेंसी में स्पेकुलेटिव बेट्स (speculative bets) का खतरा बढ़ सकता है। अगर ऊर्जा की कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो रुपये में उतार-चढ़ाव अर्थव्यवस्था को और ज़्यादा प्रभावित कर सकता है।
आगे की राह
बाज़ार के जानकारों का मानना है कि RBI के ये कदम रुपये को सहारा देने के लिए उठाए गए हैं, न कि मौद्रिक नीति में ढील देने के संकेत। रेपो रेट 5.25% पर स्थिर है और महंगाई (inflation) बढ़ने का अनुमान है, ऐसे में RBI की प्राथमिकता कीमतों को स्थिर रखना है। इन सुधारों से ग्रोथ-उन्मुख सेक्टर्स (growth-oriented sectors) को फायदा हो सकता है, लेकिन तुरंत असर बॉन्ड यील्ड्स (bond yields) को स्थिर करने में दिखेगा। विदेशी निवेश का फ्लो इस बात पर निर्भर करेगा कि ये टैक्स-फ्री रास्ते कितने सफल होते हैं।
