RBI के दखल का तरीका
भारतीय रुपया हाल के दिनों में काफी उतार-चढ़ाव से गुजरा है, जिस वजह से रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) को लगातार दखल देना पड़ रहा है। शुक्रवार को बाजार की गतिविधियों से संकेत मिलता है कि स्पॉट एक्सचेंज रेट को स्थिर करने के लिए एक सोची-समझी कोशिश की गई। इसमें सरकारी बैंकों को RBI की ओर से मुख्य एजेंट के तौर पर इस्तेमाल किया गया।
RBI ने बाजार खुलने से पहले ही बड़ी मात्रा में डॉलर बेचे, ताकि ट्रेडिंग डे की शुरुआत में ही नकारात्मक सेंटिमेंट को खत्म किया जा सके। यह एक प्री-एम्टिव स्ट्रैटेजी है, जिसका मकसद ट्रेडर्स के साइकोलॉजिकल लेवल को तोड़ना और विदेशी दबाव को कम करना होता है, जो अक्सर घरेलू बाजार की कीमतों पर असर डालता है।
भू-राजनीतिक और मैक्रोइकॉनॉमिक हालात
बाजार के खिलाड़ी इस समय मिडिल ईस्ट की स्थिरता और घरेलू एनर्जी की कीमतों के बीच के कनेक्शन पर कड़ी नजर रखे हुए हैं। रुपये का प्रदर्शन सीधे तौर पर ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) की कीमतों से जुड़ा हुआ है, क्योंकि भारत अपनी 90% तेल की जरूरतें आयात (Import) करता है।
अमेरिका और ईरान के बीच संभावित 60-दिन के सीजफायर (Ceasefire) की खबरों ने वैश्विक एनर्जी मार्केट को थोड़ी राहत दी है। पिछले हफ्ते तेल की कीमतों में 10-11% की गिरावट आई है, लेकिन इसके बावजूद, स्ट्रक्चरल ट्रेड डेफिसिट (Structural Trade Deficit) रुपये पर दबाव बनाए हुए है। फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FII) की बिकवाली जारी है, जिससे रुपया किसी भी भू-राजनीतिक तनाव के प्रति संवेदनशील बना हुआ है, खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से ऊर्जा ट्रांजिट को लेकर।
स्ट्रक्चरल कमजोरियां और नुकसान
जहां RBI का दखल थोड़े समय के लिए स्थिरता लाता है, वहीं इसकी एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। हाल के आंकड़ों के अनुसार, भारत का फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व (Foreign Exchange Reserves) एक साल से अधिक के निचले स्तर पर आ गया है। 22 मई 2026 को समाप्त सप्ताह में इसमें 7.51 बिलियन डॉलर की कमी आई। इस गिरावट का एक बड़ा कारण RBI का लगातार बाजार में डॉलर बेचकर रुपये को गिरने से रोकना रहा है।
इसके अलावा, RBI ने नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड (NDF) कॉन्ट्रैक्ट्स पर प्रतिबंधात्मक उपाय लागू किए हैं, ताकि आर्बिट्रेज (Arbitrage) को रोका जा सके। लेकिन, फिर भी वोलेटिलिटी (Volatility) का जोखिम बना हुआ है। दूसरे देशों के विपरीत, जिनकी फिस्कल पोजीशन मजबूत है, भारत का आयातित ऊर्जा पर भारी निर्भरता और अटकलों से लड़ने के लिए महंगे फॉरेक्स रिजर्व को बनाए रखने की जरूरत, एक स्ट्रक्चरल कमजोरी पैदा करती है। अगर सीजफायर के प्रयास विफल होते हैं या कच्चे तेल की कीमतें फिर से बढ़ती हैं, तो RBI की आक्रामक बचाव की क्षमता सीमित हो सकती है।
भविष्य का अनुमान
बाजार की भावना फिलहाल सतर्क बनी हुई है, क्योंकि ट्रेडर्स ईरान-अमेरिका के बीच MoU पर स्पष्टता का इंतजार कर रहे हैं। भविष्य की स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्षेत्रीय सीजफायर कितना टिकाऊ रहता है और घरेलू पूंजी प्रवाह (Capital Flows) कितना मजबूत होता है। भले ही 95-96 के स्तर पर टेक्निकल सपोर्ट (Technical Support) मजबूत हुआ है, लेकिन ट्रेड डेफिसिट का लगातार बने रहना बताता है कि आने वाली तिमाही में रुपया उच्च-वोलेटिलिटी वाले माहौल में फंसा रह सकता है, जिसके लिए RBI को सतर्क रहना होगा।
