भारतीय रुपये में जारी भारी गिरावट को थामने के लिए Reserve Bank of India (RBI) ने बड़ा एक्शन लिया है। आज से सरकारी तेल कंपनियों के लिए एक स्पेशल डॉलर विंडो खोली गई है, जो मार्केट में डॉलर की मांग को कम करेगी।
रुपये को बचाने की कोशिश
रुपया इस समय अपने ऐतिहासिक निचले स्तर 96.96 के करीब कारोबार कर रहा है। इसी दबाव को कम करने के लिए RBI ने 12 अक्टूबर से एक स्पेशल डॉलर विंडो की शुरुआत की है। इससे सरकारी तेल कंपनियों को सीधे तौर पर डॉलर मिल सकेंगे, जिससे ओपन मार्केट में डॉलर की डिमांड घटेगी और रुपये की कमजोरी पर ब्रेक लगेगा।
क्या रेट हाइक काफी है?
हाल ही में 7 अक्टूबर को RBI ने रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट्स बढ़ाकर 5.5% कर दिया था। यह लगभग 4 साल बाद की गई पहली बढ़ोतरी थी। हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि अन्य देशों के मुकाबले 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी बहुत कम है, जिससे मार्केट में पॉलिसी की क्रेडिबिलिटी को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
नए नियम और चुनौतियां
RBI ने करेंसी मार्केट में स्पेकुलेशन को रोकने के लिए कई कड़े नियम लागू किए हैं:
- बैंकों के लिए नेट ओपन पोजीशन लिमिट घटाकर $5 मिलियन कर दी गई है।
- बड़े डेरिवेटिव ट्रांजैक्शंस के लिए कैश रिजर्व की शर्तें और सख्त की गई हैं।
हालांकि, इन सबके बावजूद बैंकिंग सिस्टम में मौजूद लिक्विडिटी सरप्लस एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। भले ही RBI बॉन्ड सेल्स और वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो के जरिए एक्स्ट्रा पैसा सोखने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इसका असर सीधे तौर पर लोन दरों पर पड़ने में अभी समय लग रहा है।
निवेशकों के लिए क्या हैं संकेत?
रुपये की कमजोरी से क्रूड ऑयल जैसे इम्पोर्ट महंगे हो रहे हैं, जिससे कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ना तय है। इसके अलावा, बैंकों के लिए भी आने वाली तिमाही चुनौतीपूर्ण हो सकती है, क्योंकि लोन रेट्स तो जल्दी बढ़ जाएंगे, लेकिन डिपॉजिट रेट्स बढ़ाने का दबाव मार्जिन को कम कर सकता है। अब पूरी नजर ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतों और करेंसी की वोलेटिलिटी पर है।
