भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, जून के महीने में बैंकों ने फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर मिलने वाली ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है। नई टर्म डिपॉजिट पर यह दर बढ़कर **5.99%** हो गई है। वहीं, नए लोन की उधारी लागत में भी मामूली वृद्धि देखी गई, जो **8.53%** तक पहुंच गई। यह दिखाता है कि रेपो रेट **5.25%** पर स्थिर रहने के बावजूद बैंकों के लिए फंड जुटाना महंगा हो रहा है।
जमा दरें बढ़ीं, लिक्विडिटी पर दबाव
RBI की रिपोर्ट के मुताबिक, जून 2026 में बैंकिंग सेक्टर की ब्याज दरों में सख्ती देखी गई। शेड्यूलड कमर्शियल बैंकों के लिए डोमेस्टिक टर्म डिपॉजिट रेट में 16 बेसिस पॉइंट का इजाफा हुआ, जो मई के 5.83% से बढ़कर 5.99% हो गया। यह बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि बैंक लिक्विडिटी बनाए रखने और क्रेडिट ग्रोथ को सपोर्ट करने के लिए फंड जुटाने की होड़ में हैं।
लोन की लागत पर असर
जमा दरों में जहां अच्छी-खासी बढ़ोतरी हुई, वहीं नए फ्रेस रुपी लोन की उधारी लागत में मामूली बढ़ोतरी हुई। नए लोन पर वेटेड एवरेज लेंडिंग रेट जून में 2 बेसिस पॉइंट बढ़कर 8.53% हो गया, जो पिछले महीने 8.51% था। जमा दरों और लोन दरों में इस अंतर से बैंकों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव साफ दिख रहा है, क्योंकि नए डिपॉजिट को आकर्षित करने की लागत, नए कर्जदारों से ली जाने वाली दरों से तेजी से बढ़ रही है।
वहीं, पुराने यानी आउटस्टैंडिंग लोन पर ब्याज दरें स्थिर रहीं, जो जून में 8.96% रहीं, जबकि मई में यह 8.97% थीं। इसके अलावा, मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड्स-बेस्ड लेंडिंग रेट (MCLR) — जो अक्सर रिटेल और कॉर्पोरेट लोन की प्राइसिंग के लिए बेंचमार्क होता है — जुलाई में 10 बेसिस पॉइंट बढ़कर 8.60% हो गया। MCLR में यह बढ़ोतरी बैंकों की फंड लागत बढ़ने का ही नतीजा है, जिसका असर अंततः ग्राहकों पर होम, ऑटो और पर्सनल लोन की ब्याज दरों के रूप में दिखेगा।
रेगुलेटरी संकेत और भविष्य की राह
यह सभी दरें ऐसे समय में बढ़ी हैं जब RBI ने लगातार तीसरी बार रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखा है। रेपो रेट वह दर है जिस पर सेंट्रल बैंक कमर्शियल बैंकों को पैसा उधार देता है। ऐसे में, जब रेपो रेट स्थिर है और डिपॉजिट व लेंडिंग रेट्स बढ़ रहे हैं, तो यह माना जा सकता है कि बैंक सीधे सेंट्रल बैंक की पॉलिसी के बजाय मार्केट की लिक्विडिटी और अपनी फंड की जरूरतों के हिसाब से चल रहे हैं।
निवेशकों के लिए, आने वाले तिमाही नतीजों में यह देखना अहम होगा कि इन बढ़ती डिपॉजिट लागतों का बड़े बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) पर क्या असर पड़ता है। अगर फंड की लागत बढ़ती रहती है और बैंक पूरी लागत कर्जदारों पर नहीं डाल पाते, तो उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ सकता है। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी होगी कि क्या बैंक अपने मौजूदा मार्जिन को बनाए रख पाते हैं या आने वाले महीनों में उन्हें अपने लोन की कीमतों को और आक्रामक तरीके से बढ़ाना पड़ता है।
