RBI ने फॉरेक्स फॉरवर्ड ट्रांजैक्शंस के लिए बिना डॉक्यूमेंटेशन वाली सीमा को भारी कटौती के साथ **$100 मिलियन** से घटाकर **$5 मिलियन** कर दिया है। रुपये की गिरती चाल और सट्टेबाजी पर लगाम लगाने के लिए यह कदम उठाया गया है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा बाजार में सट्टेबाजी को नियंत्रित करने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। अब बिना किसी ट्रेड प्रूफ के फॉरवर्ड ट्रांजैक्शन की सीमा को $100 मिलियन से घटाकर सीधे $5 मिलियन कर दिया गया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब भारतीय रुपया 97 प्रति डॉलर के स्तर के करीब कारोबार कर रहा है।
बैंकों और कंपनियों पर क्या होगा असर?
पहले कंपनियां $100 मिलियन तक के सौदों के लिए बिना किसी दस्तावेजी सबूत के अपना रिस्क हेज (hedge) कर सकती थीं। लेकिन अब $5 मिलियन से ऊपर के हर ट्रांजैक्शन के लिए बैंकों को ट्रेड कॉन्ट्रैक्ट्स का सत्यापन करना अनिवार्य होगा। इससे बैंकों और कॉर्पोरेट्स दोनों के प्रशासनिक काम (administrative work) में काफी बढ़ोतरी होगी।
क्या है 'Anticipated Exposure' का विकल्प?
इस कागजी कार्रवाई से बचने के लिए ट्रेजरी डिपार्टमेंट अब 'एंटीसिपेटेड एक्सपोजर' (anticipated exposure) हेजिंग का रास्ता अपना रहे हैं। इसमें कंपनियां भविष्य के अनुमानित कैश फ्लो के आधार पर कॉन्ट्रैक्ट बुक कर सकती हैं। हालांकि, यह तरीका आसान जरूर है, लेकिन इसमें रिस्क ज्यादा है। यदि अनुमानित व्यापार नहीं हो पाता है, तो कंपनी को करेंसी कॉन्ट्रैक्ट में होने वाले नुकसान की पूरी जिम्मेदारी खुद उठानी होगी।
लागत और चुनौतियां
बैंक अभी भी 20% फॉरेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व (FERR) जैसे नियमों को संभालने में जुटे हैं, जिससे ट्रांजैक्शन की लागत पहले से ही बढ़ी हुई है। जानकारों का मानना है कि ये नए नियम भले ही सट्टेबाजी रोकने के लिए हों, लेकिन इनसे वास्तविक आयातकों (importers) पर बोझ बढ़ेगा। अब बाजार की नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या ये सख्त नियम रुपये की गिरती चाल को रोकने में वाकई कारगर साबित होंगे या फिर बैंकिंग कामकाज में देरी और अतिरिक्त लागत का कारण बनेंगे।
