RBI का NBFCs पर बड़ा एक्शन: डिफ़ॉल्टर्स को लोन देने के नियम सख्त, 'एवरग्रीनिंग' पर लगेगी लगाम

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AuthorMehul Desai|Published at:
RBI का NBFCs पर बड़ा एक्शन: डिफ़ॉल्टर्स को लोन देने के नियम सख्त, 'एवरग्रीनिंग' पर लगेगी लगाम
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रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। RBI अब ऐसे ग्राहकों को लोन देने के तरीकों की बारीकी से जांच करेगा, जिन पर पहले से ही कुछ लोन बकाया (Overdue) है।

RBI का NBFCs पर शिकंजा, लोन देने के नियम और सख्त

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) के लोन देने के तरीकों पर अपनी पैनी नजरें गड़ा दी हैं। खास तौर पर, RBI उन NBFCs की जांच कर रहा है जो उन ग्राहकों को नया लोन दे रही हैं, जिनके पुराने लोन पहले से ही 'ओवरड्यू' (Overdue) यानी बकाया चल रहे हैं, भले ही उन्हें अभी तक नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) की श्रेणी में न डाला गया हो।

बोर्ड से मंजूरी वाली पॉलिसी अब ज़रूरी

RBI का कहना है कि भले ही ये लोन देने के फैसले व्यावसायिक कारणों से लिए जा रहे हों, लेकिन इन्हें एक मजबूत, बोर्ड-अप्रूव्ड पॉलिसी (Board-Approved Policy) का आधार मिलना चाहिए। इस पॉलिसी में साफ तौर पर बताया जाना चाहिए कि ऐसे जोखिम वाले ग्राहकों को नया लोन किन परिस्थितियों में दिया जा सकता है। साथ ही, इसमें 'एवरग्रीनिंग' (Evergreening) जैसी प्रथाओं को रोकने के लिए सुरक्षा उपायों का भी जिक्र होना चाहिए। 'एवरग्रीनिंग' एक ऐसी प्रैक्टिस है जिससे खराब लोन (Stressed Assets) की असलियत छिप जाती है।

गवर्नेंस और ट्रांसपेरेंसी पर फोकस

यह कदम RBI के 2023 के अंत से वित्तीय क्षेत्र में गवर्नेंस (Governance) और रिस्क मैनेजमेंट (Risk Management) को मजबूत करने के चल रहे प्रयासों का हिस्सा है। केंद्रीय बैंक NPA की 90-दिन की समय सीमा से आगे बढ़कर, स्पेशल मेंशन अकाउंट्स (SMAs) जैसी क्रेडिट स्ट्रेस की शुरुआती स्टेज पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। स्पष्ट बोर्ड-अप्रूव्ड पॉलिसी की मांग करके, RBI, NBFCs के लोन ऑपरेशंस में अधिक जवाबदेही और पारदर्शिता लाना चाहता है। यह NBFCs के लिए नियामक ढांचे को नए सिरे से तैयार करने की एक बड़ी कोशिश का हिस्सा है।

NBFCs के लिए बढ़ी चुनौतियां

RBI के इस सख्त रुख से NBFCs के लिए कुछ नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। सबसे पहले, बोर्ड-अप्रूव्ड पॉलिसी की अनिवार्यता से अनुपालन (Compliance) का बोझ और ऑपरेशनल खर्च बढ़ सकता है, खासकर छोटी कंपनियों के लिए। दूसरे, जिन NBFCs ने ऐतिहासिक रूप से कम कड़े आंतरिक प्रक्रियाओं के माध्यम से तनावग्रस्त ग्राहकों को लोन देने पर भरोसा किया है, उन्हें अपने बिजनेस मॉडल में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं। इससे एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) ग्रोथ में नरमी आने की आशंका है। RBI का फोकस एसेट क्वालिटी, रिस्क मैनेजमेंट और ट्रांसपेरेंसी पर बना हुआ है, जिसका मतलब है कि 'लाइट-टच' रेगुलेशन का दौर तेजी से खत्म हो रहा है।

आगे का रास्ता: सख़्त रेगुलेटरी माहौल

भविष्य में, NBFCs को एक ज़्यादा कड़े रेगुलेटरी माहौल में काम करना होगा। RBI का जोर मजबूत गवर्नेंस और रिस्क मैनेजमेंट पर है, जो यह दर्शाता है कि टिकाऊ विकास और बाजार के भरोसे के लिए वित्तीय सेहत और पारदर्शिता सर्वोपरि होगी। एनालिस्ट्स का अनुमान है कि मजबूत अंडरराइटिंग स्टैंडर्ड्स और सक्रिय रिस्क मैनेजमेंट वाली NBFCs इस बदलते परिदृश्य में बेहतर स्थिति में होंगी।

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