बाजार में नकदी की भारी भरकम सरप्लस को संभालने के लिए Reserve Bank of India अब सख्त रुख अपना सकता है। ₹11 ट्रिलियन की अतिरिक्त नकदी के कारण शॉर्ट-टर्म मार्केट रेट्स रेपो रेट से नीचे गिर गए हैं, जिसे कंट्रोल करने के लिए RBI बॉन्ड सेल्स का सहारा ले सकता है।
लिक्विडिटी का रिकॉर्ड सरप्लस
देश की बैंकिंग प्रणाली में लिक्विडिटी का स्तर अब ₹11 लाख करोड़ के आंकड़े को पार कर चुका है। इतनी ज्यादा नकदी होने के कारण शॉर्ट-टर्म लेंडिंग रेट्स, RBI के मुख्य रेपो रेट से काफी नीचे आ गए हैं, जो केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने संकेत दिए हैं कि इस अतिरिक्त नकदी को सोखने के लिए अब ओपन मार्केट ऑपरेशन (OMO) के जरिए सरकारी बॉन्ड बेचे जा सकते हैं या फॉरेन एक्सचेंज स्वैप का इस्तेमाल किया जा सकता है।
ऐसा क्यों हुआ?
यह स्थिति जून 2026 में शुरू की गई 'डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा' के बाद विदेशी पूंजी के भारी प्रवाह के कारण पैदा हुई है। जब सिस्टम में जरूरत से ज्यादा पैसा होता है, तो बैंकों के बीच ब्याज दरें अनियंत्रित हो जाती हैं, जिससे महंगाई पर लगाम लगाना आरबीआई के लिए कठिन हो जाता है।
निवेशकों पर क्या होगा असर?
बॉन्ड बाजार में इस खबर के बाद हलचल तेज हो गई है। अगर आरबीआई बॉन्ड बेचता है, तो बाजार में सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities) की सप्लाई बढ़ेगी। इसका सीधा असर यह होगा कि बॉन्ड की कीमतें नीचे गिरेंगी और यील्ड (Yields) में उछाल आएगा। फिलहाल, 10-वर्षीय बेंचमार्क बॉन्ड के निवेशक इस अनिश्चितता के चलते सतर्क हैं।
आने वाले दिनों में निवेशकों को आरबीआई के ऑफिशियल नोटिफिकेशन और साप्ताहिक लिक्विडिटी डेटा पर बारीक नजर रखनी होगी, क्योंकि केंद्रीय बैंक अब वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो से आगे बढ़कर और भी कड़े कदम उठाने की तैयारी में है।
