एक्टिव मैनेजमेंट ही है वजह: RBI का बड़ा खुलासा
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने साफ किया है कि अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स की बिक्री की खबर गलत है। दरअसल, विदेशी मुद्रा भंडार (foreign exchange reserves) में जो भी उतार-चढ़ाव दिख रहा है, वह रिजर्व को मैनेज करने का तरीका है, जिसका मकसद भारतीय रुपये (INR) को मजबूती देना और मैक्रोइकॉनॉमिक स्टेबिलिटी (macroeconomic stability) बनाए रखना है। ये कोई बड़ी बिकवाली नहीं, बल्कि एसेट एलोकेशन (asset allocation) का हिस्सा है।
रिजर्व में आया बड़ा बदलाव: Gold का दबदबा बढ़ा
भारत की लॉन्ग-टर्म अमेरिकी कर्ज में हिस्सेदारी घटी है। नवंबर 2025 तक, यूएस ट्रेजरी होल्डिंग्स घटकर $174 अरब रह गई हैं, जो पिछले पांच साल का निचला स्तर है। यह 2023 के शिखर से करीब 26% कम है। अब, भारत के फॉरेक्स रिजर्व का लगभग एक-तिहाई हिस्सा ही यूएस ट्रेजरी में है, जो एक साल पहले करीब 40% था। इसके बजाय, सोने (Gold) और अन्य एसेट्स (assets) में निवेश बढ़ाया गया है। यह दिखाता है कि भारत डॉलर-डिनॉमिनेटेड एसेट्स (dollar-denominated assets) से इतर अपनी रिजर्व को डाइवर्सिफाई (diversify) कर रहा है, जैसा कि दुनिया के दूसरे बड़े देश भी कर रहे हैं। इसके बावजूद, भारत का कुल फॉरेक्स रिजर्व जनवरी 2026 के अंत तक रिकॉर्ड $723.8 अरब पर पहुंच गया है।
रुपये को संभाला, पर अब नई उम्मीदें
RBI फॉरेन एक्सचेंज मार्केट (foreign exchange market) में लगातार दखल दे रहा है, यानी डॉलर बेचकर भारतीय रुपये को गिरने से रोकने की कोशिश कर रहा है। इसके बावजूद, अप्रैल 2025 से जनवरी 2026 के बीच रुपया डॉलर के मुकाबले लगभग 5.4% कमजोर हुआ। जनवरी 2026 में यह 92.29 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब था, हालांकि 6 फरवरी 2026 को यह 90.37 के आसपास कारोबार कर रहा था।
ऐसे में, फरवरी 2026 की शुरुआत में भारत और अमेरिका के बीच हुए नए ट्रेड डील (trade deal) ने सेंटीमेंट को बूस्ट किया है। इस डील के तहत, ज्यादातर भारतीय सामानों पर अमेरिकी टैरिफ (tariffs) को 50% से घटाकर 18% कर दिया गया है। इस खबर से 3 फरवरी 2026 को रुपये में सालों की सबसे बड़ी एकदिनी तेजी देखी गई। इससे एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस (export competitiveness) बढ़ेगी और व्यापार से जुड़ी चिंताएं कम होंगी।
मैक्रोइकॉनॉमिक पिक्चर और एक्सपर्ट्स की राय
RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (Monetary Policy Committee) ने 6 फरवरी 2026 को रेपो रेट (repo rate) को 5.25% पर बरकरार रखा और न्यूट्रल स्टांस (neutral stance) बनाए रखा। ग्लोबल अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों के बीच, कमेटी ने फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ (GDP growth) का अनुमान 7.4% रखा है, जो कि काफी मजबूत है। महंगाई (inflation) का अनुमान फिलहाल कंट्रोल में है।
ग्लोबल बॉन्ड मार्केट (bond market) पर बढ़ते फिस्कल डेफिसिट (fiscal deficits) और देशों द्वारा ज्यादा कर्ज लेने का दबाव है, जिससे यूएस ट्रेजरी यील्ड्स (US Treasury yields) ऊंची रह सकती हैं। एक्सपर्ट्स की राय रुपये के भविष्य को लेकर बंटी हुई है। कुछ का मानना है कि फॉरेन इनफ्लो (foreign inflows) की धीमी रफ्तार के कारण रुपया एक दायरे में बना रहेगा, जबकि कुछ को अगले साल इसमें और कमजोरी की आशंका है।