कोलेटरल-फ्री लोन का बढ़ा दायरा
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने माइक्रो और स्मॉल एंटरप्राइजेज (MSE) के लिए कोलेटरल-फ्री (बिना गारंटी) लोन की सीमा को काफी बढ़ा दिया है। 1 अप्रैल 2026 से लागू होने वाले इस नए नियम के तहत, अब ₹20 लाख तक का लोन बिना किसी कोलेटरल के दिया जा सकेगा। यह मौजूदा ₹10 लाख की सीमा का दोगुना है, जिसे आखिरी बार 2010 में संशोधित किया गया था। इतना ही नहीं, बैंक अपनी आंतरिक क्रेडिट असेसमेंट के आधार पर इस लिमिट को ₹25 लाख तक भी बढ़ा सकते हैं। इस पॉलिसी का मुख्य उद्देश्य भारत के रोजगार और आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण MSME सेक्टर को फॉर्मल फाइनेंस तक आसान पहुंच दिलाना है।
बैंकों के सामने अनसिक्योर्ड लेंडिंग का बढ़ता जोखिम
हालांकि, इस कदम से बैंकों के लिए अनसिक्योर्ड लेंडिंग (बिना गिरवी रखे लोन देना) का जोखिम काफी बढ़ जाएगा। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय बैंकों की बैलेंस शीट मजबूत दिख रही है और ग्रॉस एनपीए (NPA) ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर पर हैं। लेकिन, बढ़ते क्रेडिट-डिपॉजिट गैप और MSME सहित कुछ सेक्टर्स में तनाव जैसी उभरती चिंताओं के बीच, बैंकों को सतर्क रहने की जरूरत होगी। बैंकिंग एक्सपर्ट्स का मानना है कि अनसिक्योर्ड लेंडिंग में नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) में वृद्धि से बचने के लिए सख्त अंडरराइटिंग (लोन की जांच-परख) और लगातार मॉनिटरिंग की आवश्यकता होगी।
MSME सेक्टर का महत्व और क्रेडिट गैप
MSME सेक्टर भारत की जीडीपी में लगभग 30% का योगदान देता है, साथ ही एक्सपोर्ट और रोजगार में भी इसका बड़ा हिस्सा है। लंबे समय से इस सेक्टर को क्रेडिट गैप (क्रेडिट की कमी) का सामना करना पड़ रहा है, जिसका अनुमान $530 बिलियन तक लगाया गया है। इसमें से केवल लगभग 14% MSMEs ही फॉर्मल क्रेडिट का लाभ उठा पाते हैं। प्रधानमंत्री रोजगार जनरेशन प्रोग्राम (PMEGP) जैसी योजनाएं मार्जिन मनी सब्सिडी के साथ सपोर्ट देती हैं, और क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेज (CGTMSE) डिफॉल्ट के जोखिम को कुछ हद तक कम करता है, लेकिन ये पूरी तरह से फाइनेंसिंग की कमी को दूर नहीं कर पाई हैं। RBI का यह कदम सेक्टर की आर्थिक अहमियत को स्वीकार करता है और क्रेडिट विस्तार को तेज करने का प्रयास है।
संभावित चुनौतियां और अतीत के सबक
MSME सेक्टर आर्थिक झटकों के प्रति स्वाभाविक रूप से संवेदनशील होता है। अकेले डिलेड पेमेंट्स (भुगतान में देरी) के कारण लगभग ₹8.1 लाख करोड़ फंसे हुए हैं। अनसिक्योर्ड लेंडिंग के इतिहास से पता चलता है कि खासकर आर्थिक मंदी के दौरान डिफ़ॉल्ट (कर्ज न चुका पाने) का खतरा बढ़ जाता है। प्राइवेट सेक्टर के बैंक, जिन्होंने अनसिक्योर्ड रिटेल लोन में उच्च स्लिपेज रेट (कर्ज डूबने की दर) देखा है, उन्हें अतिरिक्त जोखिम का सामना करना पड़ सकता है। एक बड़ी चिंता यह है कि क्या कोलेटरल-फ्री लोन की बढ़ी हुई पहुंच टिकाऊ विकास को बढ़ावा देगी या केवल मौजूदा क्रेडिट कमजोरियों को छिपाएगी, जिससे भविष्य में एनपीए का इजाफा हो सकता है।
भविष्य का आकलन: एक सोची-समझी जोखिम भरी चाल
RBI का यह नया फ्रेमवर्क एक सोची-समझी जोखिम भरी चाल है। यह एक महत्वपूर्ण आर्थिक इंजन को बढ़ावा देने की आवश्यकता को अनसिक्योर्ड लेंडिंग के अंतर्निहित जोखिमों के साथ संतुलित करता है। इस पहल की सफलता बैंकों के रिस्क असेसमेंट मॉडल की कुशलता, क्रेडिट गारंटी तंत्र की निरंतर प्रभावशीलता और व्यापक आर्थिक माहौल पर निर्भर करेगी। हालांकि विशेषज्ञ इस नीति के इरादे की सराहना करते हैं, लेकिन सतर्कता एक प्रमुख शब्द है। अगले फाइनेंशियल ईयर में यह स्पष्ट होगा कि यह नीति MSME विकास को गति देती है या बैंकिंग सेक्टर में वित्तीय अस्थिरता को बढ़ाती है।