सहकारी क्षेत्र के लिए क्रेडिट की नई राह
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि अब बैंकों द्वारा नेशनल कोऑपरेटिव डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (NCDC) को दिए जाने वाले लोन को Priority Sector Lending (PSL) के तहत गिना जाएगा। यह नया नियम 19 जनवरी 2026 से लागू होगा। इस कदम का मुख्य उद्देश्य सहकारी संस्थाओं तक संस्थागत क्रेडिट (Institutional Credit) का प्रवाह बढ़ाना है, जो भारत की कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। यह बदलाव उन पात्र बैंकों पर लागू होगा, जिनमें Regional Rural Banks (RRBs), Urban Cooperative Banks (UCBs), Small Finance Banks (SFBs), और Local Area Banks (LABs) शामिल नहीं हैं। NCDC के माध्यम से वितरित किए जाने वाले फंड को मास्टर डायरेक्शन ऑन प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग, 2025 के अनुरूप होना चाहिए। उम्मीद है कि इस पहल से NCDC को अपनी वित्तीय सहायता बढ़ाने और विभिन्न सहकारी उपक्रमों को बेहतर समर्थन देने के लिए पर्याप्त लिक्विडिटी (Liquidity) मिलेगी।
सहकारी इकोसिस्टम को मजबूत करने की कवायद
यह महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव केंद्र सरकार और RBI द्वारा सहकारी बैंकिंग सेक्टर की बुनियाद को मजबूत करने के लिए उठाए जा रहे व्यापक सुधारों का हिस्सा है। इन सुधारों में वित्तीय स्थिरता, गवर्नेंस (Governance), डिजिटल क्षमताएं और जमाकर्ताओं की सुरक्षा जैसे प्रमुख क्षेत्रों को संबोधित किया गया है। अर्बन कोऑपरेटिव बैंक्स (UCBs) को अब अपनी शाखा नेटवर्क का विस्तार करने की अनुमति मिल गई है, और उनके हाउसिंग लोन (Housing Loan) एक्सपोजर (Exposure) की सीमा को कुल एडवांस (Advances) के 10% से बढ़ाकर 25% कर दिया गया है। बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट में किए गए संशोधनों के तहत, डायरेक्टर्स (Directors) का कार्यकाल आठ साल से बढ़ाकर दस साल कर दिया गया है, जिससे गवर्नेंस में निरंतरता बनी रहेगी। डिजिटल इंटीग्रेशन (Digital Integration) को आसान बनाने के प्रयासों के तहत, सहकारी बैंकों के आधार-इनेबल्ड पेमेंट सिस्टम (AePS) पर ऑनबोर्डिंग (Onboarding) के लिए फीस कम की गई है। नेशनल अर्बन कोऑपरेटिव फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (NUCFDC) और सहकार सारथी जैसी संस्थाओं की स्थापना का उद्देश्य महत्वपूर्ण IT और ऑपरेशनल सपोर्ट (Operational Support) प्रदान करना है। वहीं, ग्रामीण सहकारी बैंकों को RBI की इंटीग्रेटेड ओम्बड्समैन स्कीम (Integrated Ombudsman Scheme) में शामिल किया गया है ताकि शिकायतों का निवारण बेहतर हो सके। सभी सहकारी बैंकों में जमाकर्ताओं को ₹5 लाख प्रति जमाकर्ता तक बीमा कवर डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन (DICGC) द्वारा प्रदान किया जाता है। इन समवर्ती सुधारों का लक्ष्य सहकारी संस्थानों के लिए एक अधिक लचीला और कुशल परिचालन वातावरण बनाना है।
NCDC: ग्रामीण विकास में बड़े असर की भूमिका
नेशनल कोऑपरेटिव डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (NCDC), जो मिनिस्ट्री ऑफ कोऑपरेशन के तहत एक वैधानिक निकाय (Statutory Body) है, पूरे भारत में सहकारी संस्थानों को फाइनेंस (Finance) करने और बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 1963 में स्थापित, NCDC का कार्यक्षेत्र पारंपरिक कृषि उपज से आगे बढ़कर ग्रामीण औद्योगिक क्षेत्रों, जल संरक्षण, एग्री-इंश्योरेंस (Agri-Insurance), और पशु स्वास्थ्य जैसी अन्य सेवाओं तक फैला हुआ है। ऐतिहासिक रूप से, NCDC ने ₹60,000 करोड़ से अधिक की वित्तीय सहायता वितरित की है। PSL फ्रेमवर्क के तहत NCDC को लोन का हालिया समावेश इसकी क्षमता को काफी बढ़ाएगा। क्रेडिट फ्लो (Credit Flow) को सुगम बनाकर, NCDC किसानों की आय दोगुनी करने, कमजोर वर्गों का समर्थन करने, महिला सहकारी समितियों को बढ़ावा देने और एग्री-इंफ्रास्ट्रक्चर (Agri-Infrastructure) विकसित करने जैसी पहलों के लिए धन को अधिक प्रभावी ढंग से चैनल कर सकेगा, जो सीधे राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों के अनुरूप हैं।
सेक्टर की परफॉरमेंस और चुनौतियाँ: एक विश्लेषणात्मक नजर
हालांकि सहकारी बैंकिंग सेक्टर ने स्थिर वृद्धि दिखाई है, फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) 24 में जमा (Deposits) और लोन बुक (Loan Book) का विस्तार हुआ है, लेकिन कृषि क्रेडिट (Agricultural Credit) में इसका ऐतिहासिक योगदान कम हुआ है। सहकारी बैंकों की कृषि में सीधी संस्थागत क्रेडिट हिस्सेदारी FY1996 में 48% से घटकर FY2022 तक 13% रह गई है, जबकि अब इस सेगमेंट में कमर्शियल बैंक (Commercial Banks) हावी हैं। नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) एक लगातार चुनौती बनी हुई हैं, खासकर आर्थिक रूप से कमजोर राज्यों में, जहां कुछ UCBs और DCCBs (District Central Cooperative Banks) ने 10% से अधिक NPA की रिपोर्ट की है। हालांकि, हाल के आंकड़ों से पता चलता है कि इसमें महत्वपूर्ण सुधार हुआ है, UCB सकल NPAs सितंबर 2021 में 15.4% से घटकर सितंबर 2025 तक 7.6% हो गया है। यह सख्त रेगुलेशन (Regulation) और बेहतर रिकवरी (Recovery) प्रयासों के प्रभाव को दर्शाता है। चल रहे सुधार, जिसमें बेहतर गवर्नेंस और वित्तीय स्वास्थ्य पहल शामिल हैं, इस ट्रेंड को उलटने और कमर्शियल बैंकों के साथ अधिक समानता बहाल करने का लक्ष्य रखते हैं, हालांकि पब्लिक सेक्टर बैंक (Public Sector Banks) अभी भी बड़े निरपेक्ष क्रेडिट वॉल्यूम (Absolute Credit Volumes) प्रदान करते हैं।
⚠️ संभावित जोखिम: एक फोरेंसिक नजर
सहकारी क्षेत्र को मजबूत करने के लिए किए गए इन समन्वित प्रयासों के बावजूद, संभावित चुनौतियां बनी हुई हैं। बढ़े हुए क्रेडिट फ्लो की प्रभावशीलता (Efficacy) NCDC की अंतिम-उधारकर्ता (End-borrower) समितियों द्वारा धन के समय पर और उचित उपयोग को सुनिश्चित करने की क्षमता पर गंभीर रूप से निर्भर करती है, जिसके लिए CAG-एम्पेनल्ड ऑडिटर (CAG-empanelled Auditors) द्वारा सख्त तिमाही प्रमाणन की आवश्यकता होगी। संपत्ति की गुणवत्ता (Asset Quality) में क्षेत्रीय असमानताएं चिंता का विषय बनी हुई हैं; जबकि उन्नत क्षेत्रों में NPA 1% से नीचे हो सकता है, आर्थिक रूप से कमजोर राज्य उच्च स्तरों से जूझ रहे हैं। हालांकि DICGC प्रति जमाकर्ता ₹5 लाख तक की जमा राशि का बीमा करता है, लेकिन सहकारी बैंकों, विशेष रूप से UCBs और DCCBs का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अभी भी 10% से अधिक NPA के साथ वर्गीकृत है, जो विशिष्ट पॉकेट्स में निरंतर तनाव का संकेत देता है। इसके अलावा, विस्तारित निदेशक कार्यकाल जैसे सुधार गवर्नेंस निरंतरता को बेहतर बनाने का लक्ष्य रखते हैं, लेकिन कमजोर प्रबंधन और पुरानी तकनीक के ऐतिहासिक उदाहरणों ने सेक्टर की प्रतिस्पर्धात्मकता को अधिक फुर्तीली NBFCs (Non-Banking Financial Companies) के मुकाबले प्रभावित किया है, जो तेज लोन प्रोसेसिंग (Loan Processing) और बेहतर ग्राहक अनुभव (Customer Experience) प्रदान कर सकते हैं। यह सुनिश्चित करना कि NCDC के माध्यम से चैनल किया गया क्रेडिट बिना किसी महत्वपूर्ण लीकेज (Leakage) या देरी के इच्छित लाभार्थियों तक प्रभावी ढंग से पहुंचेगा, सफलता का एक प्रमुख मापदंड होगा।