भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक बड़ा फैसला लेते हुए उन डिफ़ॉल्टरों (Defaulters) को बड़ा झटका दिया है, जिन्होंने बैंकों से लोन लिया था और अब वे चुका नहीं पा रहे हैं। RBI ने साफ कर दिया है कि 1 अक्टूबर 2026 से ऐसे डिफ़ॉल्टर और उनसे जुड़ी पार्टियां, बैंकों द्वारा जब्त की गई प्रॉपर्टी को वापस नहीं खरीद पाएंगी। इस नियम का मकसद खराब लोन (Bad Loans) के समाधान को और ज्यादा पारदर्शी बनाना है, जिसके तहत बैंकों को इन प्रॉपर्टी को पब्लिक नीलामी (Public Auction) के जरिए बेचना होगा।
RBI का नया नियम क्या कहता है?
RBI ने बैंकों के लिए नई गाइडलाइंस जारी की हैं, जो डिफ़ॉल्टरों से जब्त की गई प्रॉपर्टी को संभालने के तरीके को नियंत्रित करेंगी। 1 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाले इस नए फ्रेमवर्क के तहत, डिफ़ॉल्टर और उनसे जुड़ी किसी भी कंपनी को जब्त की गई प्रॉपर्टी खरीदने की इजाजत नहीं होगी। ये वो प्रॉपर्टीज़ हैं जिन्हें बैंकों ने लोन की रिकवरी के लिए अपने कब्जे में लिया है।
क्यों लाया गया ये बदलाव?
यह बदलाव एक पुरानी चिंता को दूर करने के लिए लाया गया है, जहां ऐसा देखा जाता था कि डिफ़ॉल्टर अपनी जब्त की गई प्रॉपर्टी को बाद में किसी और के ज़रिए या किसी दूसरी कंपनी के ज़रिए खरीद लेते थे। RBI का मकसद इस प्रक्रिया को पूरी तरह से पारदर्शी बनाना है, ताकि बैंक बैलेंस शीट से नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) को साफ करने में आसानी हो।
अब प्रॉपर्टीज़ की नीलामी होगी
नई गाइडलाइंस के अनुसार, बैंकों को अब इन जब्त की गई प्रॉपर्टीज़ को मुख्य रूप से पब्लिक नीलामी के ज़रिए ही बेचना होगा। RBI ने बैंकों को ये भी समय-सीमा दी है कि वे किसी भी जब्त की गई प्रॉपर्टी की बिक्री 7 साल के अंदर पूरी करें। वहीं, जिन प्रॉपर्टीज़ को बैंक 30 सितंबर 2026 से पहले अपने कब्जे में ले चुके हैं, उनके लिए ये समय-सीमा 30 सितंबर 2027 तक बढ़ाई गई है।
बैंकों को बनानी होंगी अपनी नीतियां
बैंकों को अब इन प्रॉपर्टीज़ को मैनेज करने के लिए बोर्ड से अप्रूव्ड फॉर्मल नीतियां बनानी होंगी। इन नीतियों में यह साफ होना चाहिए कि प्रॉपर्टी को कब और कैसे जब्त किया जाएगा, किसे ये फैसले लेने का अधिकार होगा, और प्रॉपर्टी जब्त करने से पहले क्या-क्या रिकवरी प्रयास किए गए थे। बैंक किसी प्रॉपर्टी को तभी अपना मान पाएंगे जब उनका उस पर पूरा लीगल टाइटल और कंट्रोल होगा।
फाइनेंसियल रिपोर्टिंग में पारदर्शिता
फाइनेंसियल रिपोर्टिंग को बेहतर बनाने के लिए RBI ने इन प्रॉपर्टीज़ के लिए नए अकाउंटिंग स्टैंडर्ड्स भी तय किए हैं। जब कोई बैंक जब्त की गई प्रॉपर्टी को अपने पास रखता है, तो उसका वैल्यूएशन या तो लोन के नेट बुक वैल्यू या फिर कम से कम दो इंडिपेंडेंट वैल्यूअर्स की रिपोर्ट के आधार पर तय की गई डिस्ट्रेस सेल वैल्यू पर होगा। सबसे ज़रूरी बात, इन प्रॉपर्टीज़ को फाइनेंसियल रिपोर्ट्स में अलग से दिखाना होगा और इन्हें ग्रॉस या नेट NPA रेश्यो जैसे स्टैंडर्ड बैंक मेट्रिक्स में शामिल नहीं किया जा सकेगा। यह कदम निवेशकों को बैंक की असल एसेट क्वालिटी और कैपिटल हेल्थ की स्पष्ट तस्वीर देने के लिए उठाया गया है।
ये नियम उन सभी अकाउंट्स से एक्वायर की गई प्रॉपर्टीज़ पर लागू होंगे जो पहले से ही नॉन-परफॉर्मिंग के तौर पर क्लासिफाई किए गए थे। पब्लिक नीलामी को बढ़ावा देकर और ओरिजिनल डिफ़ॉल्टरों को बोली लगाने से रोककर, RBI लोन समाधान प्रक्रिया में ओरिजिनल मालिकों के प्रभाव को कम करना चाहता है। निवेशकों को अब इन बदलावों पर नज़र रखनी होगी कि ये रिकवरी टाइमलाइन और NPA की कीमतों को कैसे प्रभावित करते हैं।
