RBI अब बैंकों के साथ मिलकर अप्रैल 2027 से लागू होने वाले 'Expected Credit Loss' (ECL) फ्रेमवर्क की तैयारियों को अंतिम रूप दे रहा है। नए नियम के तहत बैंकों को भविष्य के संभावित नुकसान के लिए पहले से ही प्रोविजनिंग करनी होगी, जिससे उनके कैपिटल बफर पर असर पड़ेगा।
नियम में क्या बदल रहा है?
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) अब बैंकिंग सेक्टर में बड़े बदलाव की तैयारी में है। अभी तक बैंक लोन के डूबने (NPA होने) के बाद ही प्रोविजनिंग करते थे, लेकिन 1 अप्रैल 2027 से लागू होने वाले ECL फ्रेमवर्क में बैंकों को पहले से ही भविष्य के खतरों का अंदाजा लगाकर पैसा अलग रखना होगा। यह एक 'Forward-looking' अप्रोच है, जो बैंकिंग सिस्टम को और भी पारदर्शी और सुरक्षित बनाएगी।
बैंकों पर पड़ने वाला वित्तीय दबाव
इस बदलाव के कारण बैंकों के कैपिटल बफर पर सीधा असर पड़ेगा। बड़े सरकारी बैंकों ने इसका अनुमान भी लगा लिया है:
- State Bank of India (SBI): बैंक पर लगभग ₹19,500 करोड़ का असर पड़ सकता है, जिससे CET1 रेश्यो में 40-50 बेसिस पॉइंट्स की कमी आ सकती है।
- Bank of Baroda: बैंक को ₹12,500 करोड़ का अतिरिक्त प्रोविजन करना पड़ सकता है।
- Canara Bank: बैंक के अनुमान के मुताबिक यह राशि ₹12,000 करोड़ से ₹15,000 करोड़ के बीच हो सकती है।
हालांकि, झटके से बचने के लिए RBI ने बैंकों को यह बोझ 4 सालों में बांटने की छूट दी है, जिससे उनकी वित्तीय स्थिरता बनी रहेगी।
निवेशकों के लिए बड़ी बात
शेयरधारकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आने वाले समय में बैंकों के तिमाही नतीजों में 'प्रोविजनिंग' का हिस्सा बढ़ सकता है, जिससे प्रॉफिट मार्जिन पर कुछ दबाव दिखने की संभावना है। निवेशकों को बैंकों के मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखनी चाहिए कि वे अपने इंटरनल क्रेडिट मॉडल्स को कैसे तैयार कर रहे हैं और अपनी लेंडिंग ग्रोथ को कैसे मैनेज कर रहे हैं।
