भारत के पब्लिक सेक्टर बैंकों (PSBs) ने फाइनेंशियल ईयर **2026** में रिकॉर्ड **₹1.98 लाख करोड़** का नेट प्रॉफिट दर्ज किया है। बैड लोन (GNPA) घटकर **1.93%** के निचले स्तर पर आ गए हैं, जो लंबे समय से जारी सुधारों का नतीजा है।
भारतीय सरकारी बैंकों (PSBs) ने फाइनेंशियल ईयर 2026 में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। कभी बैड लोन के बोझ से दबे रहने वाले इन बैंकों ने अब ₹1.98 लाख करोड़ का नेट प्रॉफिट कमाकर इतिहास रच दिया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (GNPA) घटकर 1.93% रह गए हैं, जो पिछले कई दशकों का सबसे निचला स्तर है। बैड लोन में आई यह बड़ी गिरावट निवेशकों के लिए एक सकारात्मक संकेत है क्योंकि अब बैंकों को प्रोविजनिंग के लिए कम पैसा अलग रखना पड़ता है, जिससे लेंडिंग के लिए कैपिटल ज्यादा बचती है।
रिफॉर्म्स का मिला फायदा
यह कामयाबी रातों-रात नहीं मिली है। 2014 से लागू किए गए स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स, बैंकों का विलय और EASE एजेंडे के तहत बेहतर गवर्नेंस का असर अब बैलेंस शीट पर दिख रहा है। अब बैंकों का ध्यान केवल क्रेडिट बांटने पर नहीं, बल्कि एक सस्टेनेबल और प्रॉफिटेबल लेंडिंग मॉडल बनाने पर है।
सरकारी स्कीमों की भूमिका
इस ग्रोथ में सरकारी योजनाओं की अहम भूमिका रही है। Pradhan Mantri Mudra Yojana के जरिए ₹43 लाख करोड़ से ज्यादा का क्रेडिट 59 करोड़ खातों तक पहुंचाया गया है। इसके अलावा, Pradhan Mantri Jan Dhan Yojana और डिजिटल बैंकिंग के विस्तार ने फाइनेंशियल इन्क्लूजन इंडेक्स को 2017 के 43.4 से बढ़ाकर 2026 में 70 पर पहुंचा दिया है।
आगे की चुनौतियां
मुनाफा तो रिकॉर्ड स्तर पर है, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। प्राइवेट सेक्टर बैंकों और फिनटेक प्लेटफॉर्म्स से डिपॉजिट जुटाने की कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है, जिससे फंड की लागत पर दबाव बढ़ सकता है। साथ ही, डिजिटल ट्रांजेक्शन बढ़ने के साथ ही साइबर फ्रॉड से बचने के लिए बैंकों को सुरक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार निवेश करना होगा।
निवेशकों को अब इन बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि ब्याज दरों के चक्र में उतार-चढ़ाव का सीधा असर इन पर पड़ता है। क्या यह रफ्तार बनी रहेगी? यह क्रेडिट डिमांड और डिपॉजिट ग्रोथ की स्थिरता पर निर्भर करेगा।
