देश के पब्लिक सेक्टर बैंकों (PSBs) में Q2 के दौरान क्रेडिट ग्रोथ **15% से 25%** रही, जबकि डिपॉजिट ग्रोथ मात्र **7% से 14%** के बीच सिमट गई। इस बढ़ते गैप के कारण बैंकों को महंगे होलसेल फंड का सहारा लेना पड़ रहा है, जिसका सीधा असर उनके प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ सकता है।
भारत के पब्लिक सेक्टर बैंकों के लिए वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही एक मिले-जुले रुझान वाली रही है। एक तरफ लोन की भारी मांग है, तो दूसरी तरफ डिपॉजिट जुटाने में बैंकों के पसीने छूट रहे हैं। क्रेडिट और डिपॉजिट ग्रोथ के बीच यह अंतर बैंकों के लिए चुनौती बन गया है।
फंड की कमी का संकट
जब बैंक जमा राशि (Deposits) से ज्यादा लोन बांटते हैं, तो उन्हें फंड जुटाने के लिए बाजार या होलसेल डिपॉजिट का सहारा लेना पड़ता है। यह सोर्स सस्ता नहीं होता, जिससे बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर बुरा असर पड़ सकता है। निवेशकों के लिए यह चिंता की बात है क्योंकि बढ़ती फंडिंग कॉस्ट मुनाफे में सेंध लगा सकती है।
बैंकों का हाल (Bank-Specific Performance)
आंकड़ों पर नजर डालें तो UCO Bank का ग्रॉस एडवांसेज 24.68% बढ़कर ₹2.88 लाख करोड़ पर पहुंच गया, जबकि डिपॉजिट में सिर्फ 14.05% की बढ़त देखी गई। इसी तरह, Punjab & Sind Bank का लोन बुक 19.37% बढ़कर ₹1.26 लाख करोड़ रहा, पर डिपॉजिट ग्रोथ 12.98% तक ही सीमित रही।
Union Bank of India ने तो 1,048 बेसिस पॉइंट्स का क्रेडिट-डिपॉजिट ग्रोथ गैप दर्ज किया है। Canara Bank का हाल भी ऐसा ही है, जहां 19.4% की क्रेडिट ग्रोथ के मुकाबले डिपॉजिट सिर्फ 13.1% बढ़े। इंडस्ट्री का लोन-टू-डिपॉजिट रेशियो अब 82% के स्तर को पार कर चुका है, जो एक बड़ा संकेत है।
CASA रेशियो पर जोर
फंडिंग की बढ़ती लागत को काबू में करने के लिए बैंक अब CASA (Current Account & Savings Account) रेशियो सुधारने पर ध्यान दे रहे हैं। Indian Bank और Union Bank of India ने इस दिशा में कुछ सुधार दिखाए हैं। निवेशकों को आने वाली तिमाहियों में यह देखना होगा कि बैंक कितनी तेजी से रिटेल डिपॉजिट जुटा पाते हैं, क्योंकि बिना सस्ते फंड के यह लोन ग्रोथ लंबे समय तक मुनाफे वाली नहीं रह पाएगी।
