भारत की संसद में एक नए बिल पर विचार चल रहा है, जिससे पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट में बदलाव हो सकता है। इस बदलाव के बाद सरकार UPI ट्रांज़ैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू कर सकती है। यह कदम डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर की बढ़ती लागत को पूरा करने के लिए उठाया जा रहा है, जिसका सीधा असर फिनटेक कंपनियों पर पड़ सकता है।
डिजिटल पेमेंट के इकोनॉमिक्स में बड़ा मोड़
भारत के डिजिटल पेमेंट सेक्टर में एक बड़ा बदलाव आने की संभावना है। सरकार पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 में एक नया संशोधन लाने की तैयारी में है। फिलहाल, इनकम-टैक्स एक्ट के तहत UPI और RuPay डेबिट कार्ड ट्रांज़ैक्शन पर कोई मर्चेंट फीस नहीं लगती। लेकिन, प्रस्तावित संशोधन के बाद, सरकार केवल एक नोटिफिकेशन जारी करके यह तय कर सकेगी कि किन डिजिटल पेमेंट मोड्स पर चार्ज लगेगा। यह मौजूदा नियमों को सरल बनाएगा।
मर्चेंट फीस की जरूरत क्यों?
डिजिटल पेमेंट इंडस्ट्री लंबे समय से मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) यानी मर्चेंट फीस की मांग कर रही है। यह फीस व्यापारियों को डिजिटल ट्रांज़ैक्शन प्रोसेस करने के लिए देनी होती है। पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया जैसे उद्योग निकायों का मानना है कि बड़े व्यापारियों पर एक छोटी सी फीस, जैसे 30 बेसिस पॉइंट्स, भी पेमेंट नेटवर्क के भारी ऑपरेशनल खर्चों को कवर करने में मदद कर सकती है। रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत के डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाए रखने और विस्तार करने का सालाना खर्च अब ₹10,000 करोड़ से अधिक हो गया है। ऐसे में, UPI पर जीरो-MDR के तहत काम करने वाले सर्विस प्रोवाइडर्स पर वित्तीय दबाव बढ़ रहा है।
सरकार का अगला कदम
अगर यह बदलाव लागू होता है, तो फीस स्ट्रक्चर तय करने की जिम्मेदारी सीधे वित्त मंत्रालय के पास आ जाएगी। इससे सरकार को संसद के नए एक्ट की जरूरत के बिना, जरूरत के हिसाब से नीतियों में बदलाव करने की सुविधा मिलेगी। पेमेंट प्लेटफॉर्म्स की स्थिरता को बनाए रखने के लिए यह एक लचीला तरीका होगा। इन खर्चों को संतुलित करने के लिए, सरकार ने पहले भी इंसेंटिव स्कीम्स के तहत ₹2,000 करोड़ का फंड कम वैल्यू वाले मर्चेंट ट्रांज़ैक्शन को सपोर्ट करने के लिए आवंटित किया है।
निवेशकों के लिए क्या मायने?
इस प्रस्तावित बिल की खबर के बाद, कई फिनटेक स्टॉक्स में हलचल देखने को मिली है। मार्केट पार्टिसिपेंट्स यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि भविष्य में फीस स्ट्रक्चर का असर प्रमुख पेमेंट प्लेयर्स के रेवेन्यू मॉडल पर क्या पड़ेगा। PhonePe और Razorpay जैसी कंपनियां, जो पब्लिक लिस्टिंग की तैयारी कर रही हैं, उनके लिए एक स्थायी फीस मॉडल लॉन्ग-टर्म प्रॉफिटेबिलिटी के लिहाज से सकारात्मक हो सकता है। हालांकि, भविष्य में लागू होने वाली फीस का सटीक ढांचा अभी भी अनिश्चित है। सरकार की प्राथमिकता छोटे व्यापारियों और आम यूजर्स को ट्रांज़ैक्शन कॉस्ट से बचाना है।
निवेशक इस बिल की प्रगति पर नजर रख सकते हैं ताकि इसके लागू होने की समय-सीमा को समझ सकें। यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा कि किन व्यापारियों पर फीस लगेगी और इसका ट्रांज़ैक्शन वॉल्यूम पर क्या असर पड़ेगा। जैसे-जैसे यह सेक्टर परिपक्व हो रहा है, इन पेमेंट प्लेटफॉर्म्स की वॉल्यूम-फोकस्ड स्ट्रैटेजी से हटकर मर्चेंट फीस के जरिए कमाई करने की क्षमता, उनके भविष्य के वित्तीय स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण संकेतक साबित होगी।
