भारत की प्राइवेट बीमा कंपनियां IRDAI से अनलिस्टेड कंपनियों में निवेश की सीमा तय करने के नियमों में बदलाव की मांग कर रही हैं। उनका कहना है कि मौजूदा प्रस्ताव, जिसमें सॉल्वेंसी मार्जिन को बेस कैपिटल से घटाया जा रहा है, काफी सख्त है। वे चाहते हैं कि यह गणना शेयरधारकों के कुल फंड के आधार पर हो, जिससे उन्हें लॉन्ग-टर्म निवेश में ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी मिल सके।
Detailed Coverage
प्राइवेट बीमा कंपनियों की IRDAI से गुहार
भारत की प्राइवेट बीमा कंपनियां इस समय रेगुलेटर IRDAI (Insurance Regulatory and Development Authority of India) के साथ मिलकर काम कर रही हैं। वे अनलिस्टेड (जिन कंपनियों के शेयर स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड नहीं हैं) कंपनियों में निवेश को लेकर बनाए जा रहे ड्राफ्ट नियमों में कुछ बदलाव चाहती हैं। मुख्य मुद्दा यह है कि इन प्राइवेट कंपनियों में कितना पैसा लगाया जा सकता है, इसकी गणना कैसे की जाए।
मौजूदा प्रस्ताव और बीमा कंपनियों की चिंता
IRDAI के ड्राफ्ट नियम के मुताबिक, अनलिस्टेड कंपनियों में निवेश की ऊपरी सीमा (ceiling) शेयरधारकों के फंड में से सॉल्वेंसी मार्जिन (solvency margin) घटाने के बाद तय होती है। सॉल्वेंसी मार्जिन एक तरह का सुरक्षा कवच है, जो यह सुनिश्चित करता है कि बीमा कंपनी के पास भविष्य के क्लेम चुकाने के लिए पर्याप्त पैसा हो। बीमा कंपनियों का कहना है कि इस मार्जिन को पहले ही घटा देने से निवेश के लिए उपलब्ध राशि काफी कम हो जाती है।
नई गणना पद्धति से क्या होगा?
बीमा कंपनियों ने IRDAI से मांग की है कि निवेश की सीमा की गणना शेयरधारकों के कुल फंड (total shareholders' funds) के आधार पर की जाए। उनका मानना है कि इससे उन्हें प्राइवेट कंपनियों में ज्यादा पैसा लगाने की गुंजाइश मिलेगी। सेक्टर के एग्जीक्यूटिव्स का कहना है कि मौजूदा ड्राफ्ट नियमों से वे हाई-ग्रोथ वाली प्राइवेट कंपनियों में निवेश करने से चूक जाएंगे। ऐसी कंपनियां, जो पब्लिक मार्केट में लिस्टेड स्टॉक या डेट इंस्ट्रूमेंट्स पर निर्भर रहने की तुलना में बेहतर रिटर्न दे सकती हैं, उनके पोर्टफोलियो को डाइवर्सिफाई करने में मदद करेंगी।
जोखिम और फ्लेक्सिबिलिटी का संतुलन
बीमा कंपनियां यह भी मानती हैं कि अनलिस्टेड एसेट्स में कुछ जोखिम होते हैं। इनमें लिक्विडिटी (तरलता) कम होती है और कीमतों का पता लगाना पब्लिक मार्केट की तुलना में मुश्किल होता है। इसलिए, रेगुलेटर आमतौर पर पॉलिसी होल्डर के फंड को बचाने के लिए सख्त सीमाएं तय करते हैं। लेकिन, इंडस्ट्री का कहना है कि एक ऐसा बीच का रास्ता निकाला जा सकता है, जहां सुरक्षा बनी रहे और साथ ही कैपिटल एलोकेशन (पूंजी आवंटन) में ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी भी मिल सके।
आगे क्या?
IRDAI फिलहाल बीमा कंपनियों के निवेश पोर्टफोलियो के लिए व्यापक नियम बना रहा है। ड्राफ्ट नियमों पर जनता से सुझाव मांगे गए थे, और इसी दौरान बीमा उद्योग ने अपनी बात मजबूती से रखी है। उनका जोर इस बात पर है कि मौजूदा गणना विधि उनके लॉन्ग-टर्म ग्रोथ और रिटर्न के लक्ष्यों के लिए बहुत सख्त साबित हो सकती है।
निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण
निवेशकों और मार्केट पार्टिसिपेंट्स को IRDAI के फाइनल नियमों पर नजर रखनी चाहिए। यह देखना अहम होगा कि क्या रेगुलेटर बीमा कंपनियों की मांग को मानते हुए निवेश सीमा के आधार में बदलाव करता है, या फिर मौजूदा सख्त गणना विधि को ही बरकरार रखता है। इस फैसले का सीधा असर इस बात पर पड़ेगा कि बीमा कंपनियां अपने एसेट मिक्स (संपत्ति मिश्रण) का प्रबंधन कैसे करती हैं और क्या यह भारत के प्राइवेट मार्केट में इंस्टीट्यूशनल कैपिटल के फ्लो को प्रभावित करेगा।
