भारत के प्राइवेट क्रेडिट मार्केट में बड़ा बदलाव आया है। 2026 की पहली छमाही में **67%** लोन **18%** से कम ब्याज दर पर दिए गए हैं। बैंकों को एक्विजिशन फाइनेंसिंग और आसान विदेशी कर्ज नियमों से मिली नई ताकत ने प्राइवेट लेंडर्स को मुश्किल में डाल दिया है।
भारत में प्राइवेट क्रेडिट का दौर अब बदल रहा है। साल 2023 में जहां 80% सौदों में ब्याज दर 18% से ज्यादा थी, वहीं 2026 की पहली छमाही तक स्थिति उलट गई है। अब 67% सौदे 18% से कम रेट पर हो रहे हैं। इसका सीधा मतलब है कि कॉरपोरेट कंपनियों के पास अब फंड जुटाने के लिए सस्ते और बेहतर विकल्प मौजूद हैं।
रेगुलेटरी बदलावों का असर
जुलाई 2026 से भारतीय बैंकों को एक्विजिशन के लिए 75% तक फाइनेंसिंग करने की अनुमति मिल गई है, जिससे प्राइवेट लेंडर्स के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। इसके अलावा, फरवरी 2026 में एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग (ECB) के नियमों को उदार बनाने से कंपनियों को विदेशी बाजार से सस्ता पैसा जुटाना आसान हो गया है।
डील्स में कमी या सामान्यीकरण?
2026 की पहली छमाही में कुल $4.6 बिलियन की फंडिंग हुई, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 54% कम है। हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह कोई क्रैश नहीं, बल्कि एक सामान्य प्रक्रिया है, क्योंकि पिछला साल Shapoorji Pallonji Group जैसी बड़ी डील्स के कारण $15.6 बिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था।
'कॉम्प्लेक्सिटी प्रीमियम' की तलाश
मुनाफे में कमी को देखते हुए, प्राइवेट क्रेडिट मैनेजर्स अब 'वनीला' यानी साधारण लोन से हटकर जटिल और रिस्की सौदों की ओर रुख कर रहे हैं। लेंडर्स अब 'कॉम्प्लेक्सिटी प्रीमियम' के जरिए अपना मार्जिन बचाने की कोशिश कर रहे हैं। निवेशकों के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती यह देखना होगा कि लेंडर्स बिना रिस्क बढ़ाए इस नई चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में कैसे खुद को ढालते हैं।
