वैल्यूएशन गैप में बड़ा अंतर
बाजार के आंकड़े दिखा रहे हैं कि प्राइवेट और सरकारी बैंकों के वैल्यूएशन में एक बड़ा अंतर आ गया है। बड़े प्राइवेट बैंक फिलहाल 15x-16x के प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) मल्टीपल पर ट्रेड कर रहे हैं, जो पिछले 3 से 5 सालों के उनके औसत से कम है। इसकी तुलना में, पिछले 18 महीनों में सरकारी बैंकों के वैल्यूएशन में जबरदस्त उछाल आया है। बैलेंस शीट में सुधार और लोन ग्रोथ के कारण पब्लिक सेक्टर बैंकों के शेयर रॉकेट बन गए, और उनके प्राइस-टू-बुक वैल्यूज लॉन्ग-टर्म एवरेज से एक स्टैंडर्ड डेविएशन ऊपर चले गए। इससे यह साफ है कि सरकारी बैंकों ने अपनी वैल्यूएशन वाली तेजी शायद पहले ही दिखा दी है। वहीं, लगातार प्रॉफिट ग्रोथ के बावजूद प्राइवेट बैंकों के शेयर गिरने से वे अब ज्यादा आकर्षक लग रहे हैं।
कमाई का फोकस बदला
बैंकिंग सेक्टर में अब बैलेंस शीट ठीक करने से ज्यादा मुख्य मुनाफे पर ध्यान दिया जा रहा है। पब्लिक सेक्टर बैंक ऐतिहासिक रूप से ट्रेजरी गेन और राइट-ऑफ किए गए लोन की रिकवरी जैसे नॉन-कोर इनकम का इस्तेमाल कर अपने घटते प्रॉफिट मार्जिन को छुपाते आए हैं। लेकिन, बॉन्ड यील्ड बढ़ने और आसान रिकवरी के मौके कम होने से इन कमाई की सस्टेनेबिलिटी पर सवाल उठ रहे हैं। इसके विपरीत, बड़े प्राइवेट बैंकों ने मजबूत डिपॉजिट बेस बनाने और फंडिंग कॉस्ट मैनेज करने पर जोर दिया है। अनुमान है कि प्राइवेट बैंक FY27 तक स्टेबल नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) बनाए रख सकते हैं, जिसका फायदा उन्हें लोन के बेहतर मिक्स और पब्लिक सेक्टर बैंकों की तुलना में कम आक्रामक लैंडिंग से मिलेगा।
प्राइवेट बैंकों के लिए जोखिम
प्राइवेट बैंकों के लिए अच्छी संभावनाओं के बावजूद, निवेशकों को कुछ जोखिमों पर भी गौर करना चाहिए। एक बड़ी चिंता यह है कि प्राइवेट बैंकों का एक्सपोजर हाई-यील्ड, अनसिक्योर्ड रिटेल लोन और माइक्रोफाइनेंस की ओर बढ़ा है। ये क्षेत्र FY22 से FY25 तक ग्रोथ के इंजन रहे, लेकिन आर्थिक मंदी आने पर सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले यही हैं। रेटिंग एजेंसियां नोट कर रही हैं कि अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं या भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण स्टैगफ्लेशन (stagflation) की स्थिति बनती है, तो ज्यादा कोलेटरलाइज्ड लोन वाले पब्लिक बैंकों की तुलना में, अनसिक्योर्ड रिटेल लेंडिंग में बड़ा एक्सपोजर रखने वाले प्राइवेट बैंकों के मुनाफे में बड़ी गिरावट आ सकती है। इसके अलावा, पूरे सेक्टर के लिए डिपॉजिट जुटाना एक चुनौती बना हुआ है, जिससे सभी बैंकों के लिए फंडिंग कॉस्ट ऊंची बनी रह सकती है और NIM ग्रोथ सीमित हो सकती है।
