भारत के बड़े प्राइवेट बैंकों ने जून तिमाही में कॉर्पोरेट लोन में डबल-डिजिट ग्रोथ दर्ज की है। वजह? कंपनियां महंगी बॉन्ड मार्केट से दूर भागकर बैंक से लोन ले रही हैं। बेहतर एसेट क्वालिटी और मजबूत बैलेंस शीट इस ट्रेंड को सपोर्ट कर रहे हैं, भले ही डिपॉजिट ग्रोथ में कुछ दिक्कतें हों। अब देखना होगा कि ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव और ग्लोबल इकोनॉमिक दबावों के बीच यह रफ्तार बनी रहती है या नहीं।
प्राइवेट बैंकों के कर्ज़ में आई तेजी
भारत के बड़े प्राइवेट सेक्टर के बैंक कॉर्पोरेट लेंडिंग (Corporate Lending) में एक बड़ी तेजी देख रहे हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि कंपनियां पहले की तरह बॉन्ड मार्केट के बजाय बैंक से फाइनेंसिंग लेना पसंद कर रही हैं। जून 2026 को खत्म हुई पहली तिमाही के नतीजों में यह ट्रेंड साफ दिखा है। पहले जहां बड़ी कंपनियां कैपिटल जुटाने के लिए बॉन्ड इश्यू को तरजीह देती थीं, वहीं अब हालात बदल गए हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि बेंचमार्क बॉन्ड यील्ड (Benchmark Bond Yields) अभी भी ऊंची बनी हुई हैं, जिससे कॉर्पोरेट डेट इश्यू (Corporate Debt Issuance) महंगा साबित हो रहा है।
किन बैंकों को हुआ फायदा?
प्राइवेट लेंडर्स में HDFC Bank सबसे आगे रहा। जून तिमाही में इसके कॉर्पोरेट लोन बुक में करीब 19% की ग्रोथ देखी गई, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह ग्रोथ महज़ 1.7% थी। ICICI Bank ने भी घरेलू कॉर्पोरेट एडवांसेज (Domestic Corporate Advances) में 18.5% की बढ़ोतरी दर्ज की, वहीं Kotak Mahindra Bank में 15% का इजाफा हुआ। Yes Bank, जो अब तक रिटेल फोकस (Retail Focus) पर ज़्यादा ध्यान देता था, उसने कॉर्पोरेट और इंस्टीट्यूशनल लोन बुक (Corporate and Institutional Loan Book) में 41% की बड़ी बढ़ोतरी दिखाई है। यह उसके क्रेडिट पोर्टफोलियो (Credit Portfolio) को डाइवर्सिफाई (Diversify) करने की एक स्ट्रेटेजिक (Strategic) चाल है।
सेक्टर की डिमांड और उधार लेने के कारण
कॉर्पोरेट सेक्टर में कर्ज़ की मांग ज़्यादातर वर्किंग कैपिटल (Working Capital) की ज़रूरतों के लिए है, न कि बड़े पैमाने पर नए प्रोजेक्ट्स के लिए। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोटिव, रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) और कमोडिटीज (Commodities) जैसे सेक्टर्स इस मांग के मुख्य चालक बनकर उभरे हैं। बैंक इस क्रेडिट पिकअप (Credit Pickup) से फायदा तो उठा रहे हैं, लेकिन वे सिलेक्टिव (Selective) बने हुए हैं और केवल उन्हीं कंपनियों को लोन दे रहे हैं जो कड़े रिस्क असेसमेंट क्राइटेरिया (Risk Assessment Criteria) पर खरी उतरती हैं। इस डिसिप्लिन (Discipline) का असर सेक्टर की मौजूदा फाइनेंशियल हेल्थ (Financial Health) में भी दिखता है, जहां ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट रेश्यो (Gross Non-Performing Asset Ratios) यानी बैड लोन (Bad Loans) का आंकड़ा कई सालों के निचले स्तर के करीब बना हुआ है।
डिपॉजिट ग्रोथ की चुनौती और लिक्विडिटी
लोन में इतनी मजबूत ग्रोथ के बावजूद, बैंकों को डिपॉजिट मोबिलाइजेशन (Deposit Mobilization) में एक चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। लोन ग्रोथ की रफ्तार से डिपॉजिट ग्रोथ मेल नहीं खा रही है। हालांकि, मार्केट की उम्मीद है कि बैंकिंग सिस्टम लिक्विडिटी (Banking System Liquidity) में बढ़ोतरी हो सकती है, क्योंकि सितंबर के अंत तक फॉरेन करेंसी डिपॉजिट (Foreign Currency Deposits) में $50 बिलियन से ज़्यादा के इनफ्लो (Inflow) की उम्मीद है। रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (Reserve Bank of India) ऐसे डिपॉजिट्स के लिए हेजिंग कॉस्ट (Hedging Costs) को सपोर्ट करने के लिए लगातार कोशिश कर रहा है। इसका मकसद बैंकों को सस्ते फंडिंग सोर्स (Funding Sources) तक पहुंचने में मदद करना है, जिससे उनके मार्जिन पर पड़ने वाला दबाव कम हो सकता है।
मार्केट के रिस्क और बाहरी फैक्टर
कॉर्पोरेट लोन बुक में यह विस्तार भले ही मज़बूत दिख रहा हो, लेकिन बैंक और निवेशक ग्लोबल मैक्रोइकॉनॉमिक कंडीशंस (Global Macroeconomic Conditions) के असर पर करीबी नज़र रखे हुए हैं। सॉवरेन 10-ईयर बॉन्ड यील्ड्स (Sovereign 10-year Bond Yields) में उतार-चढ़ाव, जो अक्सर मिडिल ईस्ट (Middle East) में जियोपॉलिटिकल टेंशन (Geopolitical Tensions) और ऑयल प्राइस (Oil Prices) को लेकर चिंताओं से प्रभावित होते हैं, उसने उधार लेने की लागत को वोलेटाइल (Volatile) बना दिया है। इन यील्ड्स में कोई भी लगातार बढ़ोतरी कॉर्पोरेशन्स के डेट मैनेजमेंट (Debt Management) को और प्रभावित कर सकती है, जिससे लोन ग्रोथ की यह ट्रेंड कितनी टिकाऊ है, इस पर असर पड़ सकता है।
निवेशक आने वाले तिमाही नतीजों पर नज़र रखेंगे कि क्या यह मजबूत लोन ग्रोथ नेट इंटरेस्ट मार्जिन (Net Interest Margins) में सुधार लाती है, खासकर अगर डिपॉजिट की लागत ऊंची बनी रहती है। इन लेंडर्स की क्षमता, यानी तेज़ी से क्रेडिट एक्सपेंशन (Credit Expansion) को स्टेबल लायबिलिटी मैनेजमेंट (Stable Liability Management) के साथ बैलेंस करना, आने वाले महीनों में उनके परफॉरमेंस (Performance) को आंकने में एक अहम फैक्टर होगी।
