भारत के बड़े प्राइवेट बैंकों के लिए अच्छी खबर! पहली तिमाही में कॉर्पोरेट लोन में ज़बरदस्त बढ़ोतरी देखी गई है. ऊंची बॉन्ड यील्ड के चलते कंपनियां अब बैंक से कर्ज लेना पसंद कर रही हैं, जो रिटेल लोन पर निर्भरता कम कर रहा है. इलेक्ट्रॉनिक्स और कमोडिटी जैसे सेक्टर्स से वर्किंग कैपिटल की मांग बढ़ी है.
कॉर्पोरेट लोन ग्रोथ में बड़ा मोड़
वित्तीय वर्ष 2027 की पहली तिमाही में भारत के प्रमुख प्राइवेट सेक्टर के बैंकों के लोन पोर्टफोलियो में एक बड़ा बदलाव नज़र आ रहा है. कई सालों तक पर्सनल और होम लोन जैसे रिटेल लोन को प्राथमिकता देने के बाद, अब कॉर्पोरेट क्रेडिट में ज़ोरदार वापसी देखने को मिल रही है. इसकी मुख्य वजह यह है कि कंपनियां बॉन्ड मार्केट से फंड जुटाने के बजाय बैंकों से कर्ज लेना ज़्यादा फायदेमंद मान रही हैं, क्योंकि बॉन्ड मार्केट में उधारी की लागत बढ़ गई है.
बड़े बैंकों के आंकड़े क्या कहते हैं?
प्रमुख प्राइवेट बैंकों की हालिया वित्तीय रिपोर्टों से इस बदलाव का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. Yes Bank ने अपने कॉर्पोरेट और इंस्टीट्यूशनल बैंकिंग पोर्टफोलियो में साल-दर-साल 41% की बढ़ोतरी दर्ज की है. HDFC Bank का कॉर्पोरेट लोन ग्रोथ 18.9% तक पहुंच गया, जो पिछले साल की समान अवधि के 1.7% के मुकाबले काफी बड़ा सुधार है. इसी तरह, ICICI Bank ने अपने डोमेस्टिक कॉर्पोरेट पोर्टफोलियो को 18.5% बढ़ाया, जबकि Kotak Mahindra Bank और Axis Bank ने क्रमश: 15% और 13% की कॉर्पोरेट लोन ग्रोथ बताई है. इन सब के चलते, जून की शुरुआत में बैंक क्रेडिट ग्रोथ की कुल दर 18.6% रही, जो लगभग दो सालों में सबसे तेज़ रफ़्तार है.
कंपनियाँ बैंकों की ओर क्यों मुड़ रही हैं?
बैंक एग्जीक्यूटिव्स के मुताबिक, बॉन्ड यील्ड (Bond Yields) का बढ़ना वह मुख्य कारण है जो कंपनियों को वापस बैंक लोन की ओर खींच रहा है. जब बॉन्ड मार्केट में ब्याज दरें ऊंची होती हैं, तो कंपनियों को फंड की ज़रूरतों के लिए बैंक की सुविधाएं ज़्यादा किफ़ायती लगने लगती हैं. फिलहाल, बड़ी-बड़ी विस्तार योजनाओं के बजाय, ज़्यादातर मांग वर्किंग कैपिटल (Working Capital) की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए आ रही है. इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) और कमोडिटी (Commodity) जैसे सेक्टरों से इन फंड्स की लगातार मांग देखी जा रही है.
जोखिम प्रबंधन और मुनाफ़ा
हालांकि कॉर्पोरेट लेंडिंग में बढ़ोतरी से बैंकों को कैपिटल डिप्लॉय (Capital Deploy) करने के नए रास्ते मिल रहे हैं, लेकिन सेक्टर के मैनेजमेंट अपनी सतर्कता बनाए हुए हैं. बैंक किसी भी कीमत पर मार्केट शेयर हासिल करने की होड़ से बच रहे हैं. इसके बजाय, वे रिटर्न-एडजस्टेड ग्रोथ (Return-Adjusted Growth) को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिसमें वे लोन देने से पहले हर बॉरोअर (Borrower) के रिस्क प्रोफाइल (Risk Profile) और विशिष्ट सेक्टर का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करते हैं. उदाहरण के लिए, ICICI Bank ने कहा है कि उनका कैपिटल एलोकेशन (Capital Allocation) लचीला बना हुआ है, और वे उसी सेगमेंट पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं - चाहे वह रिटेल हो या कॉर्पोरेट - जो बेहतर मुनाफ़ा दे. Axis Bank और Federal Bank ने भी इसी तरह के विचार व्यक्त किए हैं, यह बताते हुए कि वे मौजूदा क्लाइंट रिलेशनशिप को गहरा करने और मिड-मार्केट कॉर्पोरेट्स जैसे विशिष्ट सेगमेंट को टारगेट करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, न कि आक्रामक, व्यापक-आधारित लेंडिंग पर.
निवेशकों के लिए ध्यान देने योग्य बातें
जैसे-जैसे बैंकिंग सेक्टर इस बदलाव से गुज़र रहा है, निवेशक इस बात पर नज़र रख सकते हैं कि ये संस्थान अपने नेट इंटरेस्ट मार्जिन (Net Interest Margins) को कितनी प्रभावी ढंग से बनाए रखते हैं, जो उनकी लेंडिंग एक्टिविटीज़ के मुनाफे को दर्शाता है. इस कॉर्पोरेट क्रेडिट साइकिल की स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि बॉन्ड यील्ड ऊंची बनी रहती हैं या नहीं और वर्किंग कैपिटल की वर्तमान मांग बनी रहती है या नहीं. इसके अतिरिक्त, इन नए कॉर्पोरेट लोन बुक्स की क्वालिटी - विशेष रूप से अगले कुछ तिमाहियों में एसेट क्वालिटी (Asset Quality) और संभावित क्रेडिट जोखिमों के संबंध में - शेयरधारकों के लिए आगामी रेगुलेटरी फाइलिंग्स (Regulatory Filings) और अर्निंग कॉल्स (Earnings Calls) में निगरानी का एक प्रमुख क्षेत्र होगा.
