जुलाई में भारतीय प्राइवेट बैंकों की फ्रेश लेंडिंग स्प्रेड (Lending Spreads) बढ़कर **3.13%** के स्तर पर पहुंच गई है। इसका मुख्य कारण FCNR(B) इनफ्लो के जरिए महंगी होलसेल फंडिंग पर निर्भरता को कम करना है।
जुलाई 2026 में भारतीय प्राइवेट बैंकों के मार्जिन में सुधार देखने को मिला है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, फ्रेश लेंडिंग स्प्रेड 22 बेसिस पॉइंट्स बढ़कर 3.13% पर पहुंच गई है। बैंकों ने अपनी फंडिंग कॉस्ट को कम करने में कामयाबी हासिल की है, जबकि नए लोन पर ब्याज दरें लगभग स्थिर बनी हुई हैं।
इस सुधार की असली वजह क्या है?
बैंकों के लिए यह राहत Foreign Currency Non-Resident (Bank) यानी FCNR(B) डिपॉजिट से आई लिक्विडिटी के कारण मिली है। इस लिक्विडिटी बफर ने बैंकों को महंगी बाजार आधारित बॉरोइंग (जैसे सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट) पर अपनी निर्भरता कम करने में मदद की है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
हालांकि यह आंकड़े अच्छे दिख रहे हैं, लेकिन बैंकिंग सेक्टर के सामने चुनौतियां अभी बरकरार हैं। अगस्त 2026 के मध्य तक बैंक क्रेडिट ग्रोथ 18.3% थी, जबकि डिपॉजिट ग्रोथ केवल 14.7% रही। क्रेडिट और डिपॉजिट के बीच का यह अंतर एक बड़ी चिंता है। अगर यह गैप कम नहीं हुआ, तो बैंकों को रिटेल डिपॉजिट जुटाने के लिए ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं, जिससे उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आएगा।
इसके अलावा, FCNR(B) मोबिलाइजेशन स्कीम 31 अगस्त 2026 को खत्म हो चुकी है। अब बैंकों को भविष्य में बिना इस टेंपरेरी सपोर्ट के मार्जिन बनाए रखने के लिए डिपॉजिट जुटाने के बेहतर तरीके ढूंढने होंगे। आने वाली तिमाहियों में यह देखना अहम होगा कि बैंक अपने लोन पोर्टफोलियो और डिपॉजिट मोबिलाइजेशन के बीच कैसा संतुलन बिठा पाते हैं।
