UPI के Merchant Discount Rate (MDR) फ्रेमवर्क को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच विवाद छिड़ गया है। सवाल यह है कि क्या संसदीय समिति ने ट्रांजैक्शन फीस के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी, जिससे डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम में अनिश्चितता बढ़ गई है।
देश में UPI ट्रांजैक्शन पर लगने वाले Merchant Discount Rate (MDR) को लेकर राजनीतिक टकराव गहरा गया है। विवाद की मुख्य जड़ Parliamentary Standing Committee on Finance है, जहां इस बात पर बहस चल रही है कि क्या पैनल ने असल में उन पॉलिसी डिटेल्स को मंजूरी दी थी जो अब चर्चा में हैं।
MDR क्यों है महत्वपूर्ण?
MDR वह फीस है जो मर्चेंट डिजिटल ट्रांजैक्शन प्रोसेस करने के लिए बैंकों या पेमेंट प्रोवाइडर्स को देते हैं। भारत में लंबे समय से UPI पर 0% MDR का मॉडल चल रहा है, जिसने छोटे कारोबारियों और ग्राहकों के बीच इसे बेहद लोकप्रिय बनाया है। अगर इसमें कोई भी बदलाव होता है, तो यह फिनटेक कंपनियों के रेवेन्यू मॉडल और डिजिटल ट्रांजैक्शन की कॉस्ट पर सीधा असर डालेगा।
सरकार बनाम विपक्ष
सरकार का कहना है कि उनकी 44वीं 'एक्शन टेकन रिपोर्ट' में टियर्ड (tiered) MDR फ्रेमवर्क को अपनाने की सिफारिश की गई थी और उस समय किसी ने विरोध दर्ज नहीं कराया था। वहीं, कांग्रेस के सांसद गौरव गोगोई और मनीष तिवारी ने इस दावे को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि सरकार ने फीस की सटीक दरें, ट्रांजैक्शन की सीमा और छूट जैसी बारीकियों को कभी कमेटी के सामने विस्तार से पेश ही नहीं किया।
निवेशकों के लिए संकेत
बाजार के जानकारों और निवेशकों के लिए यह पॉलिसी अनिश्चितता का विषय है। जब बिना आम सहमति के ट्रांजैक्शन कॉस्ट में बदलाव का प्रस्ताव आता है, तो इससे कानूनी अड़चनें और भविष्य में फैसलों के पलटने का रिस्क बढ़ जाता है। फिलहाल, निवेशकों की नजर इस बात पर है कि सरकार इन चिंताओं को कैसे दूर करती है और भविष्य में लागू होने वाले MDR फ्रेमवर्क के स्लैब क्या होंगे। यही फैक्टर डिजिटल पेमेंट सेक्टर के लॉन्ग-टर्म ग्रोथ को तय करेगा।
