ट्रांसयूनियन सिबिल (TransUnion CIBIL) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में पहली बार लोन लेने वाले ग्राहकों के लिए पर्सनल लोन अब क्रेडिट कार्ड से आगे निकल गए हैं। यह बदलाव डिजिटल पेमेंट से प्रेरित उपभोक्ता की बदलती आदतों को दर्शाता है, जबकि क्रेडिट कार्ड पर डिफॉल्टर दरें अभी भी **1.7%** पर स्थिर हैं।
बदल रही है कर्ज लेने वालों की आदतें
भारत का कंज्यूमर क्रेडिट सेक्टर एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। ट्रांसयूनियन सिबिल (TransUnion CIBIL) के नए आंकड़ों से पता चलता है कि जो लोग पहली बार क्रेडिट की दुनिया में कदम रख रहे हैं, वे अब क्रेडिट कार्ड की जगह पर्सनल लोन और कंज्यूमर फाइनेंस प्रोडक्ट्स को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। यह एक महत्वपूर्ण बदलाव है क्योंकि पहले क्रेडिट हिस्ट्री बनाने के लिए क्रेडिट कार्ड ही मुख्य जरिया हुआ करता था।
क्रेडिट पोर्टफोलियो में बड़ा फेरबदल
पिछले एक दशक में ग्राहकों के व्यवहार में साफ बदलाव आया है। साल 2016 में, भारत में कंजम्पशन लेंडिंग में क्रेडिट कार्ड की हिस्सेदारी 56% थी, जो 2026 तक घटकर सिर्फ 38% रह गई है। इसका मुख्य कारण युवा पीढ़ी है, जो शुरुआत से ही कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन, पर्सनल लोन और 'बाय नाउ, पे लेटर' (BNPL) जैसी स्कीम्स को अपना रही है। ये विकल्प डिजिटल पेमेंट प्लेटफॉर्म्स के साथ इंटीग्रेटेड होने के कारण पहली बार क्रेडिट लेने वालों के लिए ज्यादा आसान साबित हो रहे हैं।
डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम का असर
यूपीआई (UPI) जैसे डिजिटल पेमेंट सिस्टम के बढ़ते इस्तेमाल ने लेंडर्स के लिए कॉम्पिटिशन का माहौल बदल दिया है। जहां क्रेडिट कार्ड सिर्फ उन्हीं मर्चेंट्स के पास एक्सेप्ट होते हैं जहां फिजिकल पॉइंट-ऑफ-सेल (POS) टर्मिनल हैं (देश भर में लगभग 1.1 करोड़), वहीं यूपीआई करीब 60 करोड़ जगहों पर चलता है। इस विशाल अंतर के कारण पर्सनल लोन और कंज्यूमर फाइनेंस प्रोडक्ट उन ग्राहकों तक पहुंच पा रहे हैं जिन्हें पहले क्रेडिट कार्ड नेटवर्क का लाभ नहीं मिल पाता था। लेंडर्स के लिए अब फोकस सिर्फ एक कार्ड जारी करने के बजाय हर ग्राहक के लिए एक बड़ा क्रेडिट पोर्टफोलियो मैनेज करने पर शिफ्ट हो रहा है।
बाजार में स्थिरता और सैचुरेशन
नए ग्राहकों को जोड़ने में क्रेडिट कार्ड की हिस्सेदारी कम होने के बावजूद, पूरा मार्केट स्ट्रेस में नहीं दिख रहा है। क्रेडिट कार्ड होल्डर्स की संख्या लगभग 5.2 करोड़ पर स्थिर हो गई है, और नए कार्ड लेने वालों में से लगभग 70% ऐसे लोग हैं जिनके पास पहले से ही कम से कम एक कार्ड है। यह मौजूदा कार्ड जारीकर्ताओं के लिए एक तरह का मार्केट सैचुरेशन (बाजार संतृप्ति) दर्शाता है। सबसे अहम बात यह है कि क्रेडिट की क्वालिटी अभी भी मजबूत है, और क्रेडिट कार्ड पर डिफॉल्टर रेट घटकर 1.7% रह गया है। इसका मतलब है कि कर्ज लेने की आदतों में बदलाव के बावजूद, मौजूदा कार्डधारक अपने कर्ज को ठीक से मैनेज कर रहे हैं।
लेंडर्स के लिए भविष्य की राह
'न्यू-टू-क्रेडिट' (पहली बार क्रेडिट लेने वाले) ग्राहकों के लिए कॉम्पिटिशन भले ही जटिल हो गया हो, लेकिन ग्रोथ की काफी संभावनाएं अभी बाकी हैं। भारत की क्रेडिट-एक्टिव आबादी का सिर्फ एक-चौथाई हिस्सा ही वर्तमान में क्रेडिट कार्ड रखता है, इसलिए शहरी और अर्ध-शहरी दोनों क्षेत्रों में अभी भी काफी गुंजाइश है। बैंकों और एनबीएफसी (NBFCs) के लिए प्रतियोगिता का अगला चरण इस बात से तय होगा कि वे सिर्फ प्रोडक्ट प्रोवाइडर से आगे बढ़कर एक लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल पार्टनर कैसे बनते हैं। निवेशकों को यह देखना होगा कि प्रमुख क्रेडिट कार्ड जारीकर्ता अपनी ग्राहक अधिग्रहण की रणनीतियों को कैसे बदलते हैं और क्या वे अपनी बाजार हिस्सेदारी बनाए रखने के लिए डिजिटल लोन प्रोडक्ट्स के साथ डीप इंटीग्रेशन पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
