UPI पर मर्चेंट फीस की मांग: पेमेंट कंपनियों की नई चाल, क्या बढ़ेंगे आपके ट्रांज़ैक्शन चार्ज?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
UPI पर मर्चेंट फीस की मांग: पेमेंट कंपनियों की नई चाल, क्या बढ़ेंगे आपके ट्रांज़ैक्शन चार्ज?

भारत में UPI ट्रांज़ैक्शन पर जीरो-फीस मॉडल पर सवाल उठने लगे हैं। पेमेंट कंपनियां अब बड़े मर्चेंट्स (व्यापारियों) से ट्रांज़ैक्शन पर छोटी फीस (Merchant Discount Rate - MDR) वसूलने की वकालत कर रही हैं, ताकि ₹8,000-10,000 करोड़ सालाना के ऑपरेशनल खर्च को पूरा किया जा सके। सरकार फिलहाल इस पर जीरो-फीस लागू करती है, लेकिन कंपनियों का कहना है कि यह मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है।

UPI इकोसिस्टम के सामने वित्तीय चुनौतियां

डिजिटल पेमेंट्स को बढ़ावा देने वाली यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के जीरो-फीस मॉडल पर अब दबाव बढ़ रहा है। पेमेंट कंपनियां लगातार ये तर्क दे रही हैं कि UPI इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाए रखने में भारी खर्च आता है, जो सालाना ₹8,000 करोड़ से ₹10,000 करोड़ के बीच है। इसमें मर्चेंट ऑनबोर्डिंग, KYC प्रक्रियाएं, इंटीग्रेशन सपोर्ट, कंप्लायंस और रिफंड जैसी सेवाएं शामिल हैं।

हालांकि, पेमेंट एग्रीगेटर इन सेवाओं को प्रदान कर रहे हैं, लेकिन उन्हें फंड की कमी का सामना करना पड़ रहा है। सरकार की ओर से UPI और RuPay इंसेटिव स्कीम के तहत मिलने वाली आर्थिक मदद भी कम हो गई है। फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए आवंटन घटाकर ₹2,000 करोड़ कर दिया गया है, जो फाइनेंशियल ईयर 2026 से कम है। कंपनियों का कहना है कि इन भुगतानों में देरी होने से अनिश्चितता बढ़ती है, जिससे छोटे शहरों और फीचर फोन यूजर्स तक डिजिटल पेमेंट पहुंचाने में निवेश करना मुश्किल हो जाता है।

प्रस्तावित फीस स्ट्रक्चर और बाजार पर असर

इन वित्तीय दिक्कतों से निपटने के लिए, इंडस्ट्री बॉडीज ने एक 'टारगेटेड' यानी लक्षित फीस स्ट्रक्चर का प्रस्ताव दिया है। वे ₹2,000 से ऊपर के ट्रांज़ैक्शन पर 15 बेसिस पॉइंट (या 0.15%) का MDR लगाने का सुझाव दे रहे हैं। उनका मानना ​​है कि इससे बड़े मर्चेंट्स से अच्छी खासी कमाई हो सकेगी, जबकि छोटे और रोजमर्रा के ट्रांज़ैक्शन पर कोई असर नहीं पड़ेगा, जो UPI की लोकप्रियता की असली वजह हैं।

Bernstein के अनुमान के मुताबिक, इस तरह के मॉडल से इकोसिस्टम के लिए सालाना लगभग $1 बिलियन (करीब ₹8,300 करोड़) का रेवेन्यू जेनरेट हो सकता है। यह प्रस्ताव ग्राहकों के लिए UPI को सस्ता बनाए रखने और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स के मुनाफे को सुनिश्चित करने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है।

निवेशकों और सेक्टर के लिए ध्यान देने योग्य बातें

यह कदम पेमेंट कंपनियों के लिए एक अहम मोड़ है। कई कंपनियां बड़े ट्रांज़ैक्शन वॉल्यूम पर निर्भर करती हैं। जून 2026 में, UPI ने 22.72 बिलियन ट्रांज़ैक्शन प्रोसेस किए, जिनकी कुल वैल्यू ₹28.92 ट्रिलियन थी। हालांकि, ट्रांज़ैक्शन फीस की कमी ने पेमेंट एग्रीगेटर्स के प्रॉफिट मार्जिन पर ऐतिहासिक रूप से दबाव डाला है।

निवेशक अब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और सरकार से आने वाले पॉलिसी अपडेट्स पर नज़र रखेंगे। यदि फीस-आधारित मॉडल की ओर कोई बदलाव होता है, तो यह लिस्टेड और प्राइवेट पेमेंट कंपनियों की रेवेन्यू विजिबिलिटी और ऑपरेटिंग मार्जिन को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकता है। सबसे अहम सवाल यह होगा कि क्या सरकार डिजिटल समावेशन के जीरो-फीस एजेंडे को प्राथमिकता देती है या फिर एक ऐसे टिकाऊ मॉडल की ओर बढ़ती है जो लक्षित मर्चेंट फीस की अनुमति देता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.