सरकारी कंपनियां (PSUs) रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) से विदेशी कर्जों के लिए डॉलर-रुपये के कंसेशनल स्वैप विंडो को मार्च 2027 तक बढ़ाने की लॉबिंग कर रही हैं। यह सुविधा सरकारी कंपनियों को बड़े कैपिटल प्रोजेक्ट्स के लिए विदेशी मुद्रा हेजिंग की लागत को मैनेज करने में मदद करती है, जिससे साल के आखिरी क्वार्टर में उनकी फंडिंग की जरूरतें आसान हो सकती हैं।
RBI से क्या है PSUs की मांग?
पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (PSUs) ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) से एक विशेष फॉरेन एक्सचेंज स्वैप विंडो को तीन महीने बढ़ाने का अनुरोध किया है। यह विंडो फिलहाल सरकारी कंपनियों को कंसेशनल रेट्स पर अपने एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स (ECBs) को हेज करने की अनुमति देती है और 31 दिसंबर 2026 को समाप्त होने वाली है। PSUs इस डेडलाइन को मार्च 2027 तक बढ़ाना चाहती हैं, ताकि चौथी तिमाही के लिए कैपिटल स्पेंडिंग प्लान्स के साथ कम लागत वाली हेजिंग की उपलब्धता बेहतर ढंग से अलाइन हो सके।
कैपिटल एक्सपेंडिचर पर असर
इस अनुरोध के पीछे मुख्य वजह कॉस्ट-इफेक्टिव फॉरेन करेंसी फंडिंग तक पहुंच बनाए रखना है। PSUs द्वारा आमतौर पर किए जाने वाले बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स के लिए, रुपये-डॉलर विनिमय दर में उतार-चढ़ाव से कर्ज की लागत काफी बढ़ सकती है। स्वैप विंडो का विस्तार करके, ये संस्थाएं अधिक स्थिर और अनुमानित फाइनेंसिंग टर्म्स सुरक्षित करना चाहती हैं। अगर RBI इस एक्सटेंशन को मंजूरी देता है, तो इससे विदेशी फंड्स का अधिक जुटाव प्रोत्साहित हो सकता है, जो सरकारी उपक्रमों के कैपिटल इन्वेस्टमेंट साइकिल को सपोर्ट करेगा।
फॉरेन करेंसी फ्लो का व्यापक संदर्भ
यह पहल बदलती वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के बीच फॉरेन करेंसी इनफ्लो को मैनेज करने के बड़े प्रयास का हिस्सा है। हाल के आंकड़ों से पता चलता है कि RBI की फॉरेन करेंसी एसेट्स जून और जुलाई 2026 के मध्य के बीच 7.6 बिलियन डॉलर बढ़ी है। इस माहौल में पब्लिक सेक्टर बैंक्स एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, जो नॉन-रेजिडेंट इंडियंस (NRIs) और अन्य विदेशी नागरिकों से अतिरिक्त डिपॉजिट्स को कैप्चर करने के लिए अपने विशाल ब्रांच नेटवर्क और पुराने क्लाइंट संबंधों का उपयोग कर रहे हैं।
वित्तीय आंकड़ों से FCNR (B) डिपॉजिट्स में महत्वपूर्ण रुचि का पता चलता है, खासकर जब मौजूदा डिपॉजिट्स की मैच्योरिटी साइकिल नए ब्याज दरों के साथ अलाइन होती है। विश्लेषकों का कहना है कि इन खातों में इनफ्लो ऐतिहासिक रूप से अस्थिर रहा है, जो FY25 में 7.1 बिलियन डॉलर की तुलना में FY26 में घटकर 946 मिलियन डॉलर रह गया था। तीन से पांच साल की FCNR (B) डिपॉजिट्स पर इंटरेस्ट रेट कैप को RBI द्वारा हटाने का उद्देश्य इस ट्रेंड को पलटना और करेंसी एनवायरनमेंट को स्थिर करना था।
अगले कदमों पर नजर
निवेशकों के लिए, एक्सटेंशन रिक्वेस्ट के संबंध में रिजर्व बैंक से आधिकारिक संचार पर नजर रखना महत्वपूर्ण अपडेट होगा। जबकि मौजूदा स्वैप सुविधा ने PSUs को एक्सटर्नल डेट मैनेज करने के लिए एक बफर प्रदान किया है, अंतिम निर्णय सेंट्रल बैंक द्वारा लिक्विडिटी और करेंसी स्टेबिलिटी के आकलन पर निर्भर करेगा। यदि यह सुविधा दी जाती है, तो कैपिटल-इंटेंसिव PSUs के लिए फाइनेंशियल फ्लेक्सिबिलिटी में सुधार हो सकता है, जिससे आने वाली तिमाहियों में उनके इंटरेस्ट कवरेज रेशियो पर दबाव कम हो सकता है। इसके विपरीत, यदि डेडलाइन अपरिवर्तित रहती है, तो PSUs को अपने बॉरोइंग प्लान्स को तेज करना पड़ सकता है या साल के अंत नजदीक आने पर उच्च हेजिंग लागतों के लिए तैयार रहना पड़ सकता है।
