बढ़ती लागत के कारण सरकारी कंपनियां (PSUs) अब बैंक लोन की जगह बॉन्ड मार्केट से फंड जुटाने को प्राथमिकता दे रही हैं। बैंकों द्वारा वसूले जाने वाले एक्स्ट्रा रिस्क और स्ट्रैटेजी प्रीमियम के चलते बॉन्ड इश्यू करना ज्यादा फायदेमंद साबित हो रहा है, जिसका उदाहरण हाल ही में REC Limited द्वारा जुटाया गया **₹4,000 करोड़** का फंड है।
सरकारी कंपनियां (PSUs) अपनी पूंजी की जरूरतों को पूरा करने के लिए अब पारंपरिक बैंक लोन को छोड़कर कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट का रुख कर रही हैं। भले ही फंडिंग के ये दोनों ही विकल्प ब्याज दरों में बदलाव के प्रति संवेदनशील हों, लेकिन टॉप-टीयर कंपनियों के लिए बैंक लोन के साथ जुड़े 'हिडन कॉस्ट्स' इसे कम आकर्षक बना रहे हैं।
कर्ज लेने की बढ़ती लागत
बैंक आमतौर पर कंपनियों के लिए अपनी स्टैंडर्ड लेंडिंग रेट्स पर अतिरिक्त लागत जोड़ते हैं, जिन्हें क्रेडिट रिस्क प्रीमियम और बिजनेस स्ट्रैटेजी प्रीमियम कहा जाता है। हाई-क्वालिटी उधारकर्ताओं के लिए, ये अतिरिक्त शुल्क लोन की लागत में 50 से 200 बेसिस पॉइंट्स तक का इजाफा कर देते हैं। यही वजह है कि बॉन्ड मार्केट की यील्ड बढ़ने के बावजूद, बैंक लोन की प्रभावी ब्याज दरें ज्यादा बनी रहती हैं, जिससे कंपनियां घरेलू डेट मार्केट की ओर आकर्षित हो रही हैं।
REC Limited का उदाहरण
इस बदलाव का ताजा उदाहरण REC Limited की हालिया फंडिंग गतिविधि है। कंपनी ने 5 साल के लिए 8.3% की यील्ड पर ₹4,000 करोड़ जुटाए। यदि इसकी तुलना बैंक की सामान्य लेंडिंग दरों (जो प्रीमियम से पहले लगभग 8.25% होती हैं) से करें, तो बॉन्ड मार्केट का फायदा साफ नजर आता है। यह कीमत का अंतर बड़ी सरकारी कंपनियों के फंडिंग फैसलों को पूरी तरह बदल रहा है।
बैंकिंग लिक्विडिटी और बढ़ती यील्ड
बॉन्ड मार्केट फिलहाल पसंद बना हुआ है, लेकिन पूंजी की लागत स्थिर नहीं है। हाल के हफ्तों में बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी में कमी आई है, जो सितंबर के ₹11 लाख करोड़ के सरप्लस स्तर से नीचे गिर गई है। आरबीआई (RBI) के ऑपरेशन्स, टैक्स आउटफ्लो और करेंसी लीकेज जैसे कारकों के कारण यह कमी आई है। इस लिक्विडिटी क्रंच के चलते 10-साल वाले AAA-रेटेड PSU बॉन्ड्स की यील्ड अब 8.25% से 8.35% के बीच पहुंच गई है।
निवेशकों के लिए संकेत
निवेशकों को यह समझना होगा कि जो कंपनियां अपने कर्ज की लागत को बेहतर तरीके से मैनेज कर रही हैं, वे भविष्य में अपने प्रॉफिट मार्जिन को बेहतर बचा पाएंगी। हालांकि, अर्थव्यवस्था में लिक्विडिटी की तंगी का मतलब है कि ओवरऑल कैपिटल की लागत बढ़ रही है। इसका दबाव उन कंपनियों पर पड़ सकता है जिनकी रेटिंग कम है और जो बॉन्ड मार्केट से सस्ता कर्ज नहीं ले सकतीं। निवेशकों के लिए अब यह देखना अहम होगा कि यह तंगी कब तक रहती है और क्या बैंक अपने लोन रेट्स को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए एडजस्ट करेंगे।
