सरकारी बैंकों (PSU Banks) के लिए एक बड़ी खबर है। LCR नॉर्म्स में बदलाव के बाद बैंकों के पास अब **₹2.1 लाख करोड़** की अतिरिक्त लिक्विडिटी उपलब्ध हो गई है, जिससे कर्ज बांटने की क्षमता में बड़ा इजाफा होगा।
सरकारी बैंकों के पास अब अपना लोन बुक बढ़ाने का बड़ा मौका है। लिक्विडिटी कवरेज रेशियो (LCR) नियमों में हालिया बदलाव के बाद बैंकों को अपनी हाई-क्वालिटी लिक्विड एसेट्स (HQLA) को बेहतर तरीके से मैनेज करने की छूट मिल गई है।
लिक्विडिटी का नया तालमेल
बैंकों को अपनी शॉर्ट-टर्म देनदारियों को पूरा करने के लिए एक निश्चित मात्रा में HQLA (कैश या सरकारी बॉन्ड्स) रखना पड़ता है। पहले कई बैंक इसे 100% की रेगुलेटरी लिमिट से काफी ज्यादा रखते थे। अब नियमों में मिली ढील के बाद बैंक इन अतिरिक्त फंड्स को सरकारी बॉन्ड्स से निकालकर सीधे लोन मार्केट में लगा सकेंगे। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब डिपॉजिट्स की रफ्तार धीमी है, लेकिन कर्ज की मांग अभी भी काफी मजबूत बनी हुई है।
क्रेडिट ग्रोथ पर असर
लगभग ₹127.9 लाख करोड़ के कुल लोन बुक वाले इस सेक्टर के लिए यह बड़ी राहत है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस कदम से बैंकों की क्रेडिट ग्रोथ में लगभग 1.7% का इजाफा हो सकता है। State Bank of India, Bank of Baroda और Union Bank of India जैसे बड़े बैंकों का लिक्विडिटी बफर पहले से ही मजबूत है, जो उन्हें इस मौके का फायदा उठाने में मदद करेगा।
निवेशकों के लिए जोखिम (Risks)
हालांकि यह लिक्विडिटी बूस्ट सकारात्मक है, लेकिन निवेशकों को लोन-टू-डिपॉजिट रेशियो (LDR) पर नजर रखनी होगी। यदि कर्ज बांटने की रफ्तार डिपॉजिट ग्रोथ से लगातार ज्यादा रहती है, तो बैंकों पर लिक्विडिटी का दबाव बढ़ सकता है। साथ ही, बैंकिंग सेक्टर में Expected Credit Loss (ECL) प्रोविजनिंग जैसे बदलावों पर भी निवेशकों को सतर्क रहने की जरूरत है। भविष्य में वही बैंक बेहतर प्रदर्शन करेंगे, जो इस नई लिक्विडिटी का इस्तेमाल सावधानी से करते हुए अपने मार्जिन और एसेट क्वालिटी को बैलेंस रख पाएंगे।
