PSU Banks की रिकॉर्ड कमाई! फिर भी प्राइवेट बैंकों से क्यों हैं सस्ते? जानें वजह

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AuthorAditya Rao|Published at:
PSU Banks की रिकॉर्ड कमाई! फिर भी प्राइवेट बैंकों से क्यों हैं सस्ते? जानें वजह

पब्लिक सेक्टर के बड़े बैंक जैसे PNB, Canara Bank और Bank of Baroda ने साल 2026 के लिए रिकॉर्ड मुनाफा दर्ज किया है। सालों की खराब लोन (Bad Loan) की सफाई के बाद यह बड़ी कामयाबी मिली है। लेकिन, इन बैंकों के शेयर अभी भी बुक वैल्यू (Book Value) के आसपास या उससे नीचे ट्रेड कर रहे हैं, जो प्राइवेट बैंकों के मुकाबले काफी कम है। यह अंतर लंबे समय से बाजार के मन में बैठे शक को दिखाता है कि क्या ये बैंक प्राइवेट बैंकों की तरह लगातार अच्छा रिटर्न दे पाएंगे।

क्या हुआ?

भारत के पब्लिक सेक्टर के बैंकों (PSUs) ने एक बड़ी वित्तीय कामयाबी हासिल की है। पंजाब नेशनल बैंक (PNB), केनरा बैंक (Canara Bank) और बैंक ऑफ बड़ौदा (Bank of Baroda) ने 2026 के फाइनेंशियल ईयर के लिए रिकॉर्ड प्रॉफिट (Profit) का ऐलान किया है। यह पिछले एक दशक के मुकाबले एक बड़ा बदलाव है, जब ये बैंक भारी NPA और सरकारी मदद के बोझ तले दबे हुए थे।

Financial Year 2026 के लिए PNB ने करीब ₹18,460 करोड़ का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट कमाया, केनरा बैंक ने ₹19,783 करोड़ और बैंक ऑफ बड़ौदा ने ₹20,058 करोड़ का प्रॉफिट दर्ज किया। यह रिकवरी NPA (Non-Performing Assets) में भारी कमी की वजह से संभव हुई है। उदाहरण के लिए, PNB का ग्रॉस NPA रेशियो FY18 के 18% से घटकर FY26 में 2.95% हो गया है। केनरा बैंक (1.84% ग्रॉस NPA) और बैंक ऑफ बड़ौदा (1.89% ग्रॉस NPA) में भी ऐसे ही सुधार देखे गए हैं।

टर्नअराउंड की कहानी

बैंकिंग सेक्टर का यह सुधार 2015 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के एसेट क्वालिटी रिव्यू (AQR) के बाद शुरू हुआ। इस रिव्यू ने बैंकों को अपने फंसे हुए लोन को पहचानने पर मजबूर किया, जो पहले रीस्ट्रक्चरिंग के जरिए छिपाए जा रहे थे। हालांकि, इससे शुरुआत में भारी नुकसान और पूंजी की कमी हुई, लेकिन इसने बैलेंस शीट को साफ कर दिया और अब बैंक प्रॉफिटेबल हो गए हैं। बैंकों ने अब खराब लोन ठीक करने के साथ-साथ स्थिर ब्याज आय (Interest Income) कमाने पर ध्यान केंद्रित किया है।

वैल्यूएशन का अंतर क्यों बना हुआ है?

बेहतर वित्तीय सेहत के बावजूद, इन बैंकों के शेयर अभी भी कम वैल्यूएशन पर ट्रेड कर रहे हैं। PNB अपनी बुक वैल्यू का लगभग 0.83 गुना पर ट्रेड कर रहा है, जबकि बैंक ऑफ बड़ौदा 0.89 गुना और केनरा बैंक 1.04 गुना पर। इसका मतलब है कि निवेशक अक्सर बैंक की संपत्ति के लिक्विडेशन वैल्यू (Liquidation Value) से कम या उसके बराबर कीमत चुका रहे हैं।

इसकी तुलना में, बड़े प्राइवेट सेक्टर के बैंक जैसे ICICI Bank और HDFC Bank अपनी बुक वैल्यू का 2.71 गुना और 2.06 गुना तक वैल्यूएशन पाते हैं। बाजार का PSU बैंकों के प्रति कम वैल्यूएशन यह दिखाता है कि निवेशक सिर्फ मौजूदा मुनाफे को नहीं, बल्कि संभावित जोखिमों को भी ध्यान में रख रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से, प्राइवेट बैंकों ने ज्यादा फुर्ती, तेज डिजिटल अपनाना और लगातार अच्छे रिटर्न रेशियो दिखाए हैं, जो उनके प्रीमियम वैल्यूएशन को सही ठहराते हैं।

चुनौतियां और जोखिम

निवेशक अक्सर PSU बैंकों को लेकर लंबी अवधि की स्थिरता की चिंताओं के कारण सतर्क रहते हैं। मौजूदा NPA भले ही कम हों, लेकिन बाजार यह देखना चाहता है कि क्या ये बैंक संभावित आर्थिक मंदी के दौरान इन स्तरों को बनाए रख सकते हैं। इसके अलावा, PSU बैंकों को अक्सर व्यावसायिक लक्ष्यों और सरकारी जनादेशों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है, जो कभी-कभी प्राइवेट सेक्टर के साथियों की तुलना में निर्णय लेने की दक्षता को प्रभावित कर सकता है। कम वैल्यूएशन इस डर को भी दर्शाता है कि उच्च ब्याज दरों या सेक्टर में मंदी के दौरान, सरकारी बैंकों को एसेट क्वालिटी पर अधिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।

आगे निवेशक क्या देखें?

यहां मुख्य बात सिर्फ मौजूदा मुनाफा नहीं, बल्कि इस कमाई की स्थिरता है। निवेशक नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs), जो अर्जित ब्याज और भुगतान किए गए ब्याज के बीच का अंतर दिखाते हैं, और क्रेडिट ग्रोथ की निरंतरता पर नजर रख सकते हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या ये बैंक प्रतिस्पर्धी बाजार में अपने लोन पोर्टफोलियो को बढ़ाते हुए अपने कम NPA स्तर को बनाए रख पाते हैं। सरकारी नीति में कोई भी बदलाव, जैसे कि बैंकिंग स्वायत्तता या पूंजी आवंटन को लेकर, निवेशक की भावना को प्रभावित कर सकता है।

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