सरकारी बैंकों (PSU Banks) के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है। बैंक लोन तो जमकर बांट रहे हैं, लेकिन उस रफ्तार से डिपॉजिट (Deposit) नहीं आ रहे हैं। इस गैप को भरने के लिए बैंकों को मार्केट से **29%** ज्यादा कर्ज लेना पड़ रहा है, जो निवेशकों के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
सरकारी बैंकों (PSU Banks) के सामने इस वक्त लेंडिंग ग्रोथ और डिपॉजिट जुटाने के बीच संतुलन बनाने की बड़ी चुनौती है। जबकि बिजनेस और रिटेल सेक्टर से लोन की डिमांड तेज है, आम जनता का पैसा (डिपॉजिट) उस रफ्तार से बैंकों में नहीं पहुंच रहा है। यह मिसमैच सरकारी बैंकों को मार्केट से महंगी उधारी लेने पर मजबूर कर रहा है, जो कि प्राइवेट सेक्टर के बैंकों से बिल्कुल अलग स्थिति है।
फंड की कमी का गणित
जून तिमाही के डेटा पर नजर डालें तो सरकारी बैंकों में डिपॉजिट ग्रोथ 10.7% रही, जबकि प्राइवेट बैंकों ने 14.3% की ग्रोथ हासिल की। इस फंडिंग गैप को पाटने के लिए PSU बैंकों ने अपनी उधारी में करीब 29% का इजाफा किया है। निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि कस्टमर डिपॉजिट फंड का सबसे सस्ता जरिया होता है, जबकि मार्केट से लिया गया कर्ज काफी महंगा पड़ता है। यदि यह ट्रेंड जारी रहा, तो बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर दबाव बढ़ना तय है।
क्या है लोन-टू-डिपॉजिट रेश्यो (LDR) का हाल?
क्रेडिट और डिपॉजिट के बीच का यह फासला बैंकिंग सिस्टम के लोन-टू-डिपॉजिट रेश्यो (LDR) को 82% के पार ले गया है, जो एक दशक का उच्चतम स्तर है। LDR जितना ज्यादा होता है, बैंक की लिक्विडिटी उतनी ही कम हो जाती है। हालांकि, सरकारी बैंकों के पास सस्ते डिपॉजिट का एक बड़ा आधार रहा है, लेकिन पिछले एक दशक में रिटेल सेविंग्स मार्केट में प्राइवेट बैंकों ने अपनी हिस्सेदारी काफी बढ़ा ली है।
राहत की बात क्या है?
फंडिंग दबाव के बावजूद बैंकों की एसेट क्वालिटी अभी मजबूत बनी हुई है। मार्च 2026 तक ग्रॉस एनपीए (Gross NPA) गिरकर 1.8% के निचले स्तर पर आ गए हैं, जिसका मतलब है कि बैंक जो पैसा बांट रहे हैं, वह वापस भी आ रहा है। इसके अलावा, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) भी सिस्टम में पर्याप्त लिक्विडिटी बनाए रखने के लिए लगातार काम कर रहा है। उदाहरण के लिए, RBI का FCNR(B) फॉरेक्स स्वैप प्रोग्राम अगस्त 2026 तक विदेशी मुद्रा की लिक्विडिटी को स्टेबल रखने में मदद करेगा।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
आने वाले समय में निवेशकों की नजर इस बात पर होनी चाहिए कि क्या सरकारी बैंक अपने डिपॉजिट जुटाने की रफ्तार बढ़ा पाते हैं। यदि LDR इसी तरह बढ़ता रहा और डिपॉजिट्स में तेजी नहीं आई, तो बैंकों की कर्ज देने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। निवेशकों को अगली तिमाही नतीजों में 'कॉस्ट ऑफ फंड्स' और मार्जिन के आंकड़ों पर पैनी नजर रखनी चाहिए ताकि पता चल सके कि बढ़ती उधारी का असर प्रॉफिटेबिलिटी पर कितना पड़ रहा है।
