सितंबर महीने में सरकारी बैंकों ने अपने फ्रेश टर्म डिपॉजिट रेट्स को **10 बेसिस पॉइंट्स** घटाकर **6.10%** कर दिया है, जबकि प्राइवेट बैंकों ने इसमें केवल **6 बेसिस पॉइंट्स** की कटौती की है। इस बदलाव से बैंकिंग सेक्टर की बदलती ब्याज दर रणनीतियों के संकेत मिल रहे हैं।
सरकारी और प्राइवेट बैंकों की ब्याज दरों में आया यह अंतर स्पष्ट करता है कि PSU बैंक लिक्विडिटी की स्थितियों के प्रति अधिक सक्रियता दिखा रहे हैं। सरकारी बैंकों ने फ्रेश लोन रेट्स में भी 6 बेसिस पॉइंट्स की कटौती की है, जिससे वे अब 7.93% पर आ गए हैं, जबकि प्राइवेट बैंक अपने लेंडिंग रेट्स 9.19% पर स्थिर रखे हुए हैं।\n\nइस बड़े फासले को देखें तो, PSU बैंक प्राइवेट बैंकों की तुलना में लोन पर 126 बेसिस पॉइंट्स कम ब्याज ले रहे हैं और डिपॉजिट्स पर 34 बेसिस पॉइंट्स अधिक दे रहे हैं। मार्केट के जानकारों के लिए यह डेटा काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह PSU बैंकों की आक्रामक प्रतिस्पर्धी रणनीति को दर्शाता है।\n\nसिस्टम के स्तर पर देखें तो, बैंकिंग सिस्टम में फ्रेश लोन की औसत ब्याज दर 10 बेसिस पॉइंट्स गिरकर 8.51% पर आ गई है। विदेशी बैंकों ने भी अपनी लेंडिंग दरों में 22 बेसिस पॉइंट्स की कटौती की है। हालांकि, मौजूदा लोन पोर्टफोलियो पर ब्याज दरें 8.96% पर स्थिर बनी हुई हैं।\n\nनिवेशकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि इसका असर बैंक के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) पर कैसा पड़ेगा। यदि लेंडिंग रेट्स, डिपॉजिट रेट्स की तुलना में तेजी से गिरते हैं, तो बैंकों का मुनाफा दबाव में आ सकता है। अब सबकी नजरें अगली तिमाही के नतीजों पर टिकी हैं कि ये बैंक किस तरह से अपनी प्रॉफिटेबिलिटी को बनाए रखते हैं।
