सरकारी बैंकों (PSBs) के सामने इस वक्त डिपॉजिट जुटाने की बड़ी चुनौती है। लोन की बढ़ती मांग के मुकाबले डिपॉजिट की रफ्तार सुस्त है, जिसके चलते बैंकों को अब महंगे होलसेल फंड का सहारा लेना पड़ रहा है।
सरकारी बैंकों (PSBs) के सामने फिलहाल एक बड़ा स्ट्रक्चरल टेस्ट है। लोन की भारी डिमांड तो है, लेकिन उसके मुकाबले डिपॉजिट आने की रफ्तार काफी धीमी पड़ गई है। जून 2026 तिमाही के आंकड़ों को देखें तो सरकारी बैंकों में डिपॉजिट ग्रोथ करीब 10.3% से 10.7% रही, जबकि प्राइवेट सेक्टर के बैंक 13.8% से 14.3% की ग्रोथ हासिल करने में सफल रहे।
महंगी उधारी और मार्जिन पर दबाव
लोन बांटने की होड़ और डिपॉजिट में कमी के कारण सरकारी बैंकों को होलसेल मार्केट से कर्ज (borrowings) लेना पड़ रहा है। इस साल की पहली तिमाही में उनकी होलसेल उधारी में सालाना आधार पर 29% का भारी उछाल आया है। इसके उलट, प्राइवेट बैंकों की उधारी में सिर्फ 3% की बढ़ोतरी हुई। जानकारों का कहना है कि होलसेल फंड रिटेल डिपॉजिट के मुकाबले काफी महंगे होते हैं। जैसे-जैसे ये कॉस्ट बढ़ेगी, सरकारी बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) पर बुरा असर पड़ना तय है।
घटता मार्केट शेयर और बढ़ता LDR
अगर पिछले एक दशक पर नजर डालें तो सरकारी बैंकों का सिस्टम डिपॉजिट में हिस्सा FY14 के 76% से घटकर मार्च 2026 में 57% पर आ गया है। वहीं, इन बैंकों का लोन-टू-डिपॉजिट रेशियो (LDR) जो एक साल पहले 77% था, वो अब बढ़कर करीब 81% तक पहुंच गया है। इसका मतलब है कि बैंक अपने उपलब्ध संसाधनों का बड़ा हिस्सा पहले ही उधार देने में खर्च कर चुके हैं।
भविष्य की चुनौती
फिलहाल सिस्टम में क्रेडिट ग्रोथ 16.5% है, जबकि डिपॉजिट ग्रोथ मात्र 11.5% पर अटकी है। अगर सरकारी बैंक अपनी डिपॉजिट जुटाने की रणनीति में बदलाव नहीं करते, तो उनकी प्रॉफिटेबिलिटी पर और दबाव बढ़ सकता है। अब निवेशकों की नजर इस बात पर है कि आने वाली तिमाहियों में बैंक अपनी लागत को कैसे कंट्रोल करते हैं और रिटेल डिपॉजिट को बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।
