सरकारी बैंक अब कृषि कर्ज बांटने के तरीके को पूरी तरह बदल रहे हैं। अब व्यक्तिगत किसानों के बजाय पूरी वैल्यू चेन को फंडिंग दी जाएगी, ताकि ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत हो सके और क्रेडिट गैप को भरा जा सके।
सरकारी बैंकों (PSBs) ने कृषि क्षेत्र को कर्ज देने की अपनी रणनीति में बड़े बदलाव का फैसला किया है। अब बैंक केवल व्यक्तिगत किसानों को लोन देने के बजाय 'क्लस्टर-बेस्ड मॉडल' अपनाएंगे। सरकार की इस नई पहल का मकसद One District One Product (ODOP) के साथ तालमेल बैठाना है, ताकि खेती से जुड़ी पूरी इकोसिस्टम—जैसे लॉजिस्टिक्स, कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट्स को एक साथ फंड किया जा सके।
वैल्यू चेन फंडिंग का फायदा
पारंपरिक तौर पर कृषि लोन का जोर केवल क्रॉप लोन (बीज और खाद) पर रहा है। लेकिन अब सरकार का मानना है कि फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान (Post-harvest losses) को रोकने के लिए सप्लाई चेन के अन्य हिस्सों को भी पूंजी की जरूरत है। इस नई नीति से ग्रामीण इकॉनमी में प्रोसेसिंग और एग्रीगेशन को रफ्तार मिलेगी।
बैंकों के लिए 6 महीने का टारगेट
सभी बैंकों को 6 महीने का समय दिया गया है ताकि वे जिले-वार (district-specific) रोडमैप तैयार कर सकें। इस प्रक्रिया में Farmer Producer Organizations (FPOs) एक अहम कड़ी का काम करेंगे, जो किसानों और प्रोसेसिंग यूनिट्स को आपस में जोड़ेंगे।
जोखिम और एसेट क्वालिटी पर असर
यह बदलाव जितना फायदेमंद दिख रहा है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी है। बैंकों को अब छोटे लॉजिस्टिक्स और प्रोसेसिंग फर्मों के रिस्क को भी समझना होगा। कृषि लोन में अक्सर NPA (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट) का खतरा बना रहता है। हालांकि बैंकों के ग्रॉस GNPA पिछले कुछ सालों में रिकॉर्ड निचले स्तर पर हैं, लेकिन इस नई व्यवस्था में इंटीग्रेटेड रिस्क को मैनेज करना बैंकों के लिए एक बड़ी परीक्षा होगी।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि बैंक अपने इंटरनल सिस्टम को कितनी तेजी से अपडेट करते हैं। आने वाली तिमाहियों में बैंकों की कमेंट्री यह तय करेगी कि क्या यह बदलाव लॉन्ग टर्म में सस्टेनेबल क्रेडिट ग्रोथ ला पाएगा या फिर इससे बैड लोन का दबाव बढ़ेगा।
