RBI की नई स्वैप (Swap) सुविधा के बाद से पब्लिक सेक्टर बैंकों (PSBs) में फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (बैंक) डिपॉजिट (FCNR(B) deposits) और विदेशी उधारी (foreign borrowings) में ज़बरदस्त रुचि देखी जा रही है। इस कदम का मकसद देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करना है, और बैंकों ने अमेरिका, यूके, और सिंगापुर जैसे प्रमुख हब से अच्छी खासी इनफ्लो (inflows) की रिपोर्ट दी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बैंकों को GIFT City यूनिट्स के ज़रिए अपनी पहुंच और बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया है।
बैंकों में कैसे आई डिपॉजिट की बहार?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को पब्लिक सेक्टर बैंकों (PSBs) और वित्तीय संस्थानों के प्रमुखों के साथ एक अहम बैठक की। इस मीटिंग का एजेंडा था - विदेशी मुद्रा को आकर्षित करने के लिए हाल ही में शुरू की गई पहलों की प्रगति का जायज़ा लेना। खासकर, इस बात पर ज़ोर दिया गया कि 5 जून 2026 को शुरू हुई रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की फॉरेन करेंसी स्वैप (Swap) सुविधाओं से विदेशी मुद्रा भंडार (forex reserves) को कितना बूस्ट मिला है और भुगतान संतुलन (balance of payments) कैसे सुधरा है।
FCNR(B) डिपॉजिट्स को मिला नया जीवन
बैंक एग्जीक्यूटिव्स ने बताया कि भारतीय समुदाय (Indian diaspora) से फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (बैंक) डिपॉजिट्स, जिन्हें FCNR(B) डिपॉजिट्स भी कहते हैं, पर सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। इसके अलावा, एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स (External Commercial Borrowings) और ओवरसीज़ फॉरेन करेंसी बॉरोइंग्स (Overseas Foreign Currency Borrowings) में भी अच्छी दिलचस्पी देखी जा रही है। इस ट्रेंड का एक बड़ा कारण RBI का वो फैसला है जिसमें FCNR(B) डिपॉजिट्स पर इंटरेस्ट रेट सीलिंग (interest rate ceiling) को हटा दिया गया है। इससे बैंक अब ज्यादा कॉम्पिटिटिव रिटर्न दे पा रहे हैं, जो इन डिपॉजिट्स को पहले के मुकाबले नॉन-रेजिडेंट इन्वेस्टर्स के लिए ज़्यादा आकर्षक बना रहा है।
ग्लोबल हब और GIFT City का कमाल
बैंकों ने यह भी बताया कि यूके, यूएस, हांगकांग, सिंगापुर और वेस्ट एशिया जैसे बड़े फाइनेंशियल सेंटर्स से इन स्कीम्स की डिमांड काफी ज़्यादा है। इस ग्रोथ को बनाए रखने के लिए, पब्लिक सेक्टर के लेंडर्स (lenders) गुजरात के GIFT City में स्थित अपने इंटरनेशनल बैंकिंग यूनिट्स (International Banking Units) का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। इस इकोसिस्टम का फायदा उठाकर बैंक ग्लोबल फंड पूल्स (global fund pools) तक ज़्यादा आसानी से पहुंच बना पा रहे हैं।
लगातार नज़र और भविष्य की उम्मीदें
मीटिंग के दौरान RBI ने अपने डेली रिपोर्टिंग फ्रेमवर्क (daily reporting framework) पर भी ज़ोर दिया, जिससे सभी पार्टिसिपेटिंग संस्थानों में इनफ्लो (inflows) की रियल-टाइम मॉनिटरिंग (real-time monitoring) की जा सके। इस ट्रांसपेरेंसी (transparency) से सेंट्रल बैंक को स्वैप सुविधाओं की इफेक्टिवनेस (effectiveness) का अंदाजा लगाने में मदद मिलती है। बैंक ऑफिशियल्स को भरोसा है कि एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स का मोबिलाइजेशन (mobilization) जारी रहेगा, खासकर 2026-27 के फाइनेंशियल ईयर की तीसरी तिमाही (third quarter) में।
निवेशकों के लिए, सबसे अहम बात यह है कि इन लिक्विडिटी-फोकस्ड (liquidity-focused) उपायों से एक्सटर्नल सेक्टर की रेजिलिएंस (resilience) में सुधार पर ज़ोर दिया जा रहा है। फाइनेंस मिनिस्टर ने लेंडर्स से कहा है कि वे NRI कम्युनिटी को इफेक्टिवली एंगेज (engage) करने के लिए अपने डिजिटल आउटरीच प्रोग्राम्स (digital outreach programs) को बेहतर बनाते रहें। FCNR(B) डिपॉजिट्स के लिए स्वैप विंडो (swap window) 30 सितंबर 2026 तक खुली रहेगी, जबकि एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स और ओवरसीज़ फॉरेन करेंसी बॉरोइंग्स की सुविधा 31 दिसंबर 2026 तक उपलब्ध है। इन्वेस्टर्स आने वाले बैंक क्वार्टरली रिजल्ट्स (quarterly results) पर नज़र रख सकते हैं ताकि पता चल सके कि इन डिपॉजिट इनफ्लोज़ (deposit inflows) से प्रमुख लेंडर्स के कॉस्ट ऑफ फंड्स (cost of funds) या लिक्विडिटी पोजीशन (liquidity positions) में सुधार होता है या नहीं।
