SBI कॉन्क्लेव में प्रधान सचिव PK Mishra ने कहा कि भारत को अब पारंपरिक कोलैटरल-आधारित कर्ज से हटकर प्रोजेक्ट की कमाई पर आधारित लेंडिंग मॉडल की ओर बढ़ना होगा, ताकि ग्लोबल अनिश्चितताओं से निपटा जा सके।
बदल रहा है कर्ज देने का तरीका
SBI के बैंकिंग और इकोनॉमिक्स कॉन्क्लेव में प्रधान सचिव PK Mishra ने साफ कर दिया है कि देश के वित्तीय ढांचे को अब एक नई दिशा की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पिछले 3 दशकों में हमारा ध्यान फाइनेंशियल इंक्लूजन पर था, लेकिन अब वक्त 'लॉन्ग-टर्म ग्रोथ' के लिए एक सक्षम ढांचा बनाने का है।
गिरवी (Collateral) से आजादी की तैयारी
मिश्रा के अनुसार, बैंकों को अब केवल फिजिकल एसेट जैसे जमीन या बिल्डिंग के आधार पर कर्ज नहीं देना चाहिए। इसके बजाय, बैंकों को कर्ज देते समय 'प्रोजेक्ट इकोनॉमिक्स' और कंपनी की भविष्य में कमाई करने की क्षमता पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इससे उन नए उद्यमियों (First-generation entrepreneurs) और सर्विस एक्सपोर्टर्स को बड़ी राहत मिलेगी, जिनके पास गिरवी रखने के लिए भारी संपत्ति तो नहीं है, लेकिन उनका बिजनेस मॉडल बहुत मजबूत है।
बैड डेट्स पर लगाम
यह नया बदलाव बैंकों को पुराने 'बैड डेट्स' (Bad Debts) के चक्र से बचाने में भी मदद करेगा। जब लेंडिंग का आधार बिजनेस की असल कमाई होगी, तो पैसा उन कंपनियों तक जाएगा जो वास्तव में प्रोडक्टिव और सस्टेनेबल हैं। इससे भविष्य में बैंकों को एसेट क्लीन-अप के संकट से नहीं जूझना पड़ेगा।
बॉन्ड मार्केट को मिलेगी मजबूती
सरकार का मानना है कि केवल बैंकों पर निर्भरता भारत जैसे बढ़ते इकोनॉमी के लिए काफी नहीं है। इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी ट्रांजिशन जैसे बड़े लक्ष्यों को फंड करने के लिए देश को कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट को और गहरा करने की जरूरत है। सरकार का जोर अब घरेलू बचत (Domestic Savings) को ऐसी जगह लगाने पर है जो बाहरी झटकों को झेल सके और देश की मैन्युफैक्चरिंग को और रफ्तार दे सके।
