PFRDA ने वित्त मंत्रालय से मांग की है कि UPI के माध्यम से NPS में किए जाने वाले योगदान को आगामी मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) से छूट दी जाए। रेगुलेटर का तर्क है कि यह बचत ट्रांसफर है, न कि कोई कमर्शियल लेनदेन।
रेगुलेटर का तर्क: क्यों नहीं लगनी चाहिए फीस?
PFRDA ने आधिकारिक तौर पर वित्त मंत्रालय से NPS में होने वाले योगदान को MDR के दायरे से बाहर रखने की मांग की है। 15 अक्टूबर, 2026 से ₹2,000 से ज्यादा के UPI लेनदेन पर नए शुल्क लागू होने वाले हैं। रेगुलेटर का साफ कहना है कि अपनी ही रिटायरमेंट बचत खाते में पैसे डालना कोई व्यावसायिक गतिविधि नहीं है, बल्कि एक पर्सनल सेविंग्स ट्रांसफर है।
सब्सक्राइबर पर असर का डर
अगर इस पर कमर्शियल फीस लगा दी जाती है, तो यह 2.34 करोड़ सब्सक्राइबर्स के लिए एक अतिरिक्त बोझ बन सकता है। D-Remit और e-NPS जैसी सुविधाओं का उपयोग करने वाले निवेशकों के लिए रिटायरमेंट प्लानिंग महंगी हो सकती है। रेगुलेटर इसे रिटायरमेंट के प्रति निवेशकों के उत्साह को कम करने वाला कदम मान रहा है।
पहले ही बदल चुके हैं चार्जेस
हाल ही में 1 अक्टूबर, 2026 से PFRDA ने पॉइंट्स ऑफ प्रेजेंस (PoP) के लिए रिवाइज्ड फीस स्ट्रक्चर लागू किया है, जिसमें ₹200 का ऑनबोर्डिंग चार्ज और 0.20% का एनुअल मेंटेनेंस चार्ज शामिल है। रेगुलेटर का मानना है कि जब सेवाएं पहले से ही महंगी हो गई हैं, तो डिजिटल कॉन्ट्रिब्यूशन को सस्ता बनाए रखना जरूरी है।
फिलहाल, निवेशकों की नजर अब वित्त मंत्रालय के जवाब पर है। सब्सक्राइबर्स को सलाह दी जाती है कि वे PFRDA या National Securities Depository Limited (NSDL) के सर्कुलर पर नजर रखें, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि 15 अक्टूबर के बाद उनके UPI ट्रांजेक्शन पर कोई एक्स्ट्रा चार्ज लगेगा या नहीं।
