PFC-REC Merger: सरकार की 'गवर्नमेंट कंपनी' स्टेटस पर बड़ा संकट! ₹35,000 करोड़ की जरूरत?

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
PFC-REC Merger: सरकार की 'गवर्नमेंट कंपनी' स्टेटस पर बड़ा संकट! ₹35,000 करोड़ की जरूरत?
Overview

Power Finance Corporation (PFC) और Rural Electrification Corporation (REC) के मर्जर (Merger) को बोर्ड की मंजूरी मिल गई है, जिससे पावर फाइनेंसिंग सेक्टर में एक नई महाकाय इकाई (Behemoth) का जन्म होगा, जिसकी **लोन बुक ₹11.5 लाख करोड़** की होगी। हालांकि, इस ऐतिहासिक कदम के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है: मर्जर के बाद सरकार की हिस्सेदारी **51%** के 'सरकारी कंपनी' (Government Company) स्टेटस के लिए जरूरी न्यूनतम स्तर से नीचे, करीब **42%** तक गिर सकती है। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार को भारी पूंजी (Capital) लगानी पड़ सकती है।

PFC और REC का यह प्रस्तावित मर्जर पावर फाइनेंसिंग सेक्टर में एक बड़ी ताकत बनाने की ओर एक अहम कदम है। लेकिन, इस डील का असली पेंच सरकारी हिस्सेदारी को लेकर फंस गया है। 'सरकारी कंपनी' के तौर पर अपनी पहचान बनाए रखने के लिए सरकार को एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

सरकारी हिस्सेदारी पर बड़ा सवाल

फिलहाल, सरकार की PFC में 56% हिस्सेदारी है। वहीं, प्रस्तावित शेयर स्वैप रेशियो (Share Swap Ratio) - यानी REC के हर 7 शेयर के बदले PFC के 6 शेयर - के बाद, मर्जर के बाद बनी नई PFC में सरकार की हिस्सेदारी घटकर करीब 42% रह जाने का अनुमान है। यह भागीदारी कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 2(45) के तहत 'सरकारी कंपनी' (Government Company) के लिए जरूरी न्यूनतम 51% की सीमा से काफी कम है। इस स्टेटस को बनाए रखने के लिए सरकार के पास अब कुछ मुश्किल विकल्प हैं।

क्या हैं समाधान?

सरकारी कंपनी का दर्जा बनाए रखने के लिए सरकार को या तो PFC को एक बड़ा बायबैक (Buyback) करने का निर्देश देना पड़ सकता है (जिसमें सरकार हिस्सा नहीं लेगी), या फिर PFC में करीब ₹32,000 करोड़ से ₹35,000 करोड़ की भारी पूंजी (Capital) डालनी पड़ सकती है। एक और संभावना यह भी है कि सरकार 'सरकारी कंपनी' की परिभाषा को ही बदलने के लिए कानून में संशोधन कर दे, जिसमें हिस्सेदारी की सीमा 26% तक की जा सकती है, हालांकि इसकी अनिश्चितता ज्यादा है। अगर पूंजी डाली जाती है, तो इससे PFC के आउटस्टैंडिंग शेयर्स बढ़ेंगे, जो कंपनी के कैपिटल एडिक्वेसी रेशियो (CAR) पर असर डाल सकता है और भविष्य की ग्रोथ को प्रभावित कर सकता है।

बनेगी पावर फाइनेंसिंग की नई महाकाय इकाई

इस मर्जर से बनने वाली इकाई पावर फाइनेंसिंग में एक दिग्गज के तौर पर उभरेगी। इसका कंबाइंड लोन बुक (Loan Book) ₹11.5 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। यह स्केल कैनरा बैंक जैसे बड़े भारतीय बैंकों के करीब होगा, जिनका Q2 FY26 तक कुल बिजनेस लगभग ₹26.79 लाख करोड़ था। इस संयुक्त लोन पोर्टफोलियो में 40% डिस्ट्रीब्यूशन, 29% कन्वेंशनल जनरेशन, 14% रिन्यूएबल्स (Renewables) और बाकी का हिस्सा ट्रांसमिशन, इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स में बंटा होगा। Q3 FY26 के आंकड़ों के अनुसार, अनुमानित ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (GNPA) रेशियो 1.3% और रिटर्न ऑन एसेट्स (RoA) लगभग 3% रहने का अनुमान है, जो एक स्वस्थ वित्तीय स्थिति दर्शाता है। तुलना के लिए, SBI का Q3 FY26 में RoA 1.19% था और यह लगभग 1.75x के प्राइस-टू-बुक (P/B) रेशियो पर ट्रेड करता है, जबकि PFC और REC 1.1x के P/B मल्टीपल पर ट्रेड कर रहे थे (10 फरवरी 2026 तक)।

जोखिम और चुनौतियां (The Bear Case)

हालांकि मर्जर से बड़ा स्केल मिलेगा, लेकिन कुछ जोखिमों पर भी बारीकी से गौर करने की जरूरत है। सबसे पहले, ऑपरेटिंग कॉस्ट सिनर्जी (Operating Cost Synergy) यानि लागत में बड़ी बचत की उम्मीदें कम हैं, क्योंकि PFC और REC पहले से ही कम ओवरहेड्स पर काम कर रहे हैं, जो आमतौर पर कुल आय का 1% से कम होता है। इसके अलावा, PFC को RBI से फरवरी 2024 में लिक्विडिटी रिस्क मैनेजमेंट (Liquidity Risk Management) में चूक के कारण जुर्माना भरना पड़ा था, जो ऑपरेशनल कमजोरियों को दिखाता है। PFC को Gensol Engineering जैसे डिफॉल्टरों से ₹307 करोड़ का बकाया भी वसूलना है, जो क्रेडिट रिस्क मैनेजमेंट (Credit Risk Management) की चुनौतियों को उजागर करता है। ऐतिहासिक तौर पर, कुछ विदेशी सरकारी संस्थाओं में भ्रष्टाचार के आरोप (सीधे PFC या REC से जुड़े नहीं) भी ऐसे सरकारी उपक्रमों में संभावित गवर्नेंस (Governance) के जोखिमों की याद दिलाते हैं। लागत में खास बचत न होने से, मुख्य फायदा बड़े स्केल के कारण बरोइंग कॉस्ट (Borrowing Cost) में कमी का होगा, न कि आंतरिक दक्षता का। भारतीय PSU बैंकों के मर्जर के पिछले अनुभव बताते हैं कि घोषणाओं से अल्पावधि में फायदा हो सकता है, लेकिन दीर्घकालिक सफलता एग्जीक्यूशन (Execution) और वित्तीय मजबूती पर निर्भर करती है, और कुछ अध्ययनों में मर्जर घोषणा के बाद बिडर और टारगेट बैंकों के रिटर्न पर नकारात्मक प्रभाव भी देखा गया है।

आगे क्या?

मर्जर की सफलता काफी हद तक सरकार द्वारा अपनी हिस्सेदारी को लेकर उठाए जाने वाले ठोस कदमों पर निर्भर करेगी। 'सरकारी कंपनी' स्टेटस के मुद्दे का स्पष्ट समाधान हुए बिना, मर्जर की प्रक्रिया - जिसमें स्वतंत्र वैल्यूएशन, शेयरधारक और नियामक मंजूरी, और NCLT क्लीयरेंस शामिल हैं - में कई महीनों की देरी हो सकती है। UBS और Motilal Oswal जैसे एनालिस्ट्स ने बेहतर प्राइजिंग पावर (Pricing Power) और होल्डिंग कंपनी डिस्काउंट (Holding Company Discount) खत्म होने जैसे फायदों की ओर इशारा किया है, लेकिन ये सब मालिकाना हक की संरचना और ऑपरेशनल इंटीग्रेशन के सफल समाधान पर ही निर्भर करेगा। ऐसे में, बाजार अब सरकार की ओर से पूंजी निवेश की घोषणा या 'सरकारी कंपनी' की परिभाषा को लेकर स्पष्टता का इंतजार करेगा, जो इस नई पावर फाइनेंसिंग पावरहाउस की दीर्घकालिक दिशा तय करेगा।

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