Power Finance Corporation (PFC) और REC Ltd. ने अपने कंसोलिडेशन (Consolidation) की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए ज़रूरी सलाहकारों की नियुक्ति कर ली है। PFC ने RBSA Advisors को वैल्यूएशन कंसल्टेंट (Valuation Consultant) और SBI Capital Markets Ltd. को मर्चेंट बैंकर (Merchant Banker) के तौर पर चुना है। इस मर्जर का मकसद एक बड़ी इकाई बनाना है जो भारत की एनर्जी और इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग (Infrastructure Financing) को मज़बूत कर सके। यह कदम पब्लिक सेक्टर की नॉन-बैंकिंग फाइनेंसियल कंपनियों (NBFCs) को ज़्यादा एफिशिएंट (Efficient) बनाने और बाज़ार में उनकी मौजूदगी बढ़ाने की सरकारी योजना के अनुरूप है।
हालांकि, यह नियुक्तियां 23 मार्च 2026 को ऐसे समय में हुईं जब वैश्विक बाज़ारों में बड़ी गिरावट देखी गई। मध्य-पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों ने एनर्जी सप्लाई और महंगाई को लेकर चिंताएं बढ़ा दीं। इसके चलते Brent क्रूड के दाम $108 प्रति बैरल के पार चले गए और भारतीय रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। घरेलू शेयर बाज़ार में भी भारी गिरावट आई, BSE Sensex 2.46% गिरकर 72,696.39 अंकों पर बंद हुआ। इस अस्थिरता के माहौल में, PFC का शेयर 5.24% गिरकर (एक्स-डिविडेंड एडजस्टमेंट के बाद) ₹391.20 पर बंद हुआ, वहीं REC Ltd. के शेयर में 4.26% की और ज़्यादा गिरावट आई और यह ₹316.45 पर बंद हुआ, जो कि इसका 52-वीक लो (52-week low) था। इस गिरावट से निवेशकों की संपत्ति में लगभग ₹14 लाख करोड़ की कमी आई, क्योंकि सभी सेक्टरल इंडेक्स लाल निशान में बंद हुए।
वैलिडेशन (Valuation) की बात करें तो PFC और REC का P/E रेश्यो (P/E Ratio) अपने प्रतिस्पर्धियों की तुलना में आकर्षक लग रहा है। PFC का P/E रेश्यो लगभग 4.08 से 5.40 के बीच है, जबकि REC का P/E रेश्यो 5.05 से 5.45 के दायरे में है। यह इंडियन रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी (IREDA) के P/E 22.3 या इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉर्पोरेशन (IRFC) के P/E 17.66 से काफी कम है। यह अंतर यह बता सकता है कि बाज़ार PFC और REC से कम ग्रोथ की उम्मीद कर रहा है या उन्हें वैल्यू स्टॉक (Value Stock) के तौर पर देख रहा है। PFC ने मार्च 2019 में REC में 52.63% हिस्सेदारी लेकर इसे अपनी सहायक कंपनी बनाया था, जो कंसोलिडेशन का एक शुरुआती प्रयास था।
एनालिस्ट्स (Analysts), जिनमें Motilal Oswal और UBS शामिल हैं, आम तौर पर PFC-REC मर्जर को सकारात्मक मानते हैं। उन्हें लागत में भारी बचत, ऑपरेशनल एफिशिएंसी (Operational Efficiencies) और लेंडर्स (Lenders) के साथ बेहतर बार्गेनिंग पावर (Bargaining Power) की उम्मीद है। Motilal Oswal ने दोनों शेयरों पर 'Buy' रेटिंग दोहराई है, क्योंकि उन्हें उम्मीद है कि इन कंपनियों का वैल्यूएशन और सुधर सकता है। Fitch Ratings ने भी कंसोलिडेशन के पीछे के रणनीतिक कारणों को स्वीकार करते हुए स्टेबल रेटिंग (Stable Ratings) की पुष्टि की है।
हालांकि, सरकारी दबाव के बावजूद, इस मर्जर को लागू करने में कई महत्वपूर्ण जोखिम (Risks) हैं। सलाहकारों की नियुक्ति एक ज़रूरी कदम है, लेकिन स्मूथ इंटीग्रेशन (Smooth Integration) की गारंटी नहीं है। पब्लिक सेक्टर बैंकों (PSU Banks) के पिछले मर्जर में अक्सर IT सिस्टम को एक साथ लाने, कंपनी कल्चर को मिलाने और कर्मचारियों के मनोबल को प्रभावित करने जैसी ऑपरेशनल दिक्कतें सामने आई हैं। इसके अलावा, मर्ज हुई इकाई का पावर सेक्टर पर ध्यान केंद्रित होगा, खासकर राज्य बिजली वितरकों की भुगतान संबंधी समस्याओं को देखते हुए। कुछ आलोचकों का कहना है कि जोखिम को एक बड़ी इकाई में समूहित करने से वह खत्म नहीं हो जाता, खासकर प्रोजेक्ट फेल होने की स्थिति में। पावर-फोक्स्ड NBFCs के बीच कम प्रतिस्पर्धा से उधारकर्ताओं के लिए उधारी की लागत बढ़ सकती है, जिसे CreditSights ने भी स्वीकार किया है। PSU बैंक मर्जर के ऐतिहासिक उदाहरणों से पता चलता है कि लंबे समय में फायदे तो होते हैं, लेकिन छोटी अवधि में मैनेजमेंट का ध्यान भटकना और क्रेडिट रिकवरी में देरी जैसी समस्याएं आ सकती हैं। REC शेयरहोल्डर्स (Shareholders) शेयर स्वैप रेश्यो (Share Swap Ratio) पर सवाल उठा सकते हैं, क्योंकि हाल के दिनों में PFC ने बेहतर प्रदर्शन किया है।
PFC और REC का सफलतापूर्वक मर्जर इन जटिलताओं को दूर करने पर निर्भर करेगा। एनालिस्ट्स का मानना है कि ऑपरेशन को सुव्यवस्थित करने और लेंडर्स से अधिक लीवरेज (Leverage) हासिल करने से महत्वपूर्ण सिनर्जी (Synergies) देखने को मिल सकती हैं, जिससे यह संयुक्त इकाई एक प्रमुख सरकारी-समर्थित लेंडर के रूप में स्थापित होगी। लंबी अवधि की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य की यूटिलिटीज (Utilities) अपना कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capital Expenditure) बढ़ाती हैं और मर्ज हुई इकाई अपने सेक्टर-स्पेसिफिक रिस्क (Sector-Specific Risks) और इंटीग्रेशन के मुद्दों को प्रभावी ढंग से मैनेज करती है। सरकारी निगरानी, जिसमें बोर्ड की नियुक्तियां शामिल हैं, मर्ज हुई इकाई को राष्ट्रीय ऊर्जा और इन्फ्रास्ट्रक्चर लक्ष्यों के साथ संरेखित रखेगी।
