भारत में स्पोर्ट्स और एंटरटेनमेंट सेक्टर में अब प्राइवेट इक्विटी (PE) फर्मों का जोर बढ़ रहा है। देश की स्पोर्ट्स इकोनॉमी **₹18,864 करोड़** के पार पहुंच गई है, लेकिन निवेशकों को बढ़ती लागत और अनिश्चित खर्चों के जोखिम को भी समझना होगा।
बदलती उपभोक्ता पसंद
भारत में 'एक्सपीरियंस इकोनॉमी' का दौर आ गया है। युवा अब सामान खरीदने के बजाय स्पोर्ट्स, कॉन्सर्ट और लाइव इवेंट्स पर खर्च करना पसंद कर रहे हैं। यही वजह है कि साल 2025 तक घरेलू लाइव इवेंट्स और एंटरटेनमेंट मार्केट का वैल्यूएशन ₹13,600 करोड़ तक आंका गया है।
स्पोर्ट्स सेक्टर बना हॉटस्पॉट
स्पोर्ट्स इकोनॉमी, जिसमें फ्रेंचाइजी रेवेन्यू, स्पॉन्सरशिप और मीडिया राइट्स शामिल हैं, अब ₹18,864 करोड़ की ऊंचाई पर है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण IPL है, जहां टिकट सेल्स 2008 में महज ₹120 करोड़ थी, जो 2025 में बढ़कर ₹500 करोड़ तक पहुंच गई है। यह मुनाफा कमाने की क्षमता ही है जिसने संस्थागत निवेशकों (Institutional Investors) को आकर्षित किया है।
बड़े प्लेयर्स का रुझान
Warburg Pincus और L Catterton जैसी दिग्गज ग्लोबल फर्म्स अब ऐसे प्लेटफॉर्म्स पर दांव लगा रही हैं जो फिटनेस और ट्रैवल जैसी सेवाओं को जोड़ते हैं। CVC द्वारा Gujarat Titans में अपनी हिस्सेदारी Torrent Group को बेचना इस बात का संकेत है कि भारतीय स्पोर्ट्स फ्रेंचाइजी में अर्ली इन्वेस्टर्स के लिए बड़ी संभावना है।
निवेश का जोखिम (The Catch)
इन्वेस्टर्स को सिक्के का दूसरा पहलू भी देखना चाहिए। लाइव इवेंट्स में कस्टमर एक्विजिशन कॉस्ट (CAC) काफी ज्यादा है। चूंकि एंटरटेनमेंट पर किया जाने वाला खर्च 'डिस्क्रिशनरी' (ऐच्छिक) होता है, इसलिए आर्थिक मंदी आने पर इन कंपनियों की कमाई पर सबसे पहले असर पड़ सकता है। भविष्य में वही कंपनियां सफल होंगी जो हाई कॉस्ट के बावजूद सस्टेनेबल मार्जिन बनाए रखने में कामयाब होंगी।
