भारत में प्राइवेट इक्विटी (PE) कंपनियां अब अपने सीनियर मैनेजमेंट की सैलरी और बोनस को कंपनी के एग्जिट टारगेट्स से जोड़ रही हैं। करीब **7 साल** के लंबे होल्डिंग पीरियड और निवेशकों को पैसा वापस लौटाने के दबाव के बीच यह नया फॉर्मूला अपनाया जा रहा है।
मैनेजमेंट इंसेटिव प्रोग्राम का बढ़ता चलन
प्राइवेट इक्विटी कंपनियां अब 'मैनेजमेंट इंसेटिव प्रोग्राम' के जरिए सीधे तौर पर मुनाफे को टारगेट कर रही हैं। अब पोर्टफोलियो कंपनियों के सीनियर लीडर्स को मिलने वाला पैसा सीधे तौर पर Internal Rate of Return (IRR) या कुल निवेशित पूंजी के मल्टीपल पर निर्भर करेगा। इसका सीधा मकसद यह है कि मैनेजमेंट का ध्यान कंपनी की सेल या पब्लिक लिस्टिंग के जरिए निवेशकों को कैश वापस लौटाने पर केंद्रित रहे।
क्यों आया ये बदलाव?
आज के मुश्किल मार्केट दौर में डील पूरी करना और लिक्विडिटी जुटाना बड़ी चुनौती बन गया है। होल्डिंग पीरियड औसतन 7 साल तक खिंच जाने के कारण निवेशकों का दबाव बढ़ा है। इस दबाव को कम करने के लिए, फर्म्स अब बेहतरीन एक्जीक्यूटिव्स को लुभाने के लिए ऐसे परफॉरमेंस-लिंक्ड बोनस का सहारा ले रही हैं जो एग्जिट के समय उन्हें बड़ा मुनाफा दिला सके।
गवर्नेंस और रिस्क फैक्टर
हालांकि यह मॉडल आकर्षक लगता है, लेकिन कॉर्पोरेट गवर्नेंस एक्सपर्ट्स ने 'शॉर्ट-टर्मिज्म' (Short-termism) को लेकर चेतावनी दी है। खतरा यह है कि मैनेजमेंट केवल एग्जिट के लिए कंपनी को आकर्षक बनाने पर ध्यान दे सकता है, न कि लंबे समय की सस्टेनेबल ग्रोथ पर। ऐसे फैसलों से कंपनी की ऑपरेशनल स्टेबिलिटी दांव पर लग सकती है।
SEBI की कड़ी नजर
खासकर लिस्टेड कंपनियों के मामले में, SEBI के कड़े नियम लागू होते हैं। कंपनसेशन स्ट्रक्चर में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए बोर्ड और शेयरहोल्डर्स की मंजूरी अनिवार्य है। यदि मैनेजमेंट के निजी स्वार्थ और शेयरहोल्डर्स के हितों में तालमेल नहीं बैठा, तो भविष्य में कानूनी विवाद भी खड़े हो सकते हैं। निवेशकों को सलाह है कि वे रेगुलेटरी फाइलिंग्स में इन एग्रीमेंट्स को ध्यान से पढ़ें और देखें कि कहीं मैनेजमेंट केवल शॉर्ट-टर्म वैल्यूएशन के चक्कर में कंपनी की नींव को कमजोर तो नहीं कर रहा।
