भारत का GIFT City 100 से ज़्यादा ग्लोबल कंपनियों के लिए एक बड़ा आकर्षण साबित हो रहा है। ये कंपनियां अपने सेंट्रलाइज्ड ट्रेजरी ऑपरेशन (Centralized Treasury Operations) के लिए इस ज़ोन में सेटअप लगाने पर विचार कर रही हैं। इसकी मुख्य वजह है यहाँ फॉरेन-करेंसी (Foreign-currency) और रुपए दोनों में अकाउंट संभालने की सुविधा, साथ ही टैक्स में मिलने वाली भारी छूट।
GIFT City में क्यों बढ़ रही है Multinational कंपनियों की रुचि?
भारत का गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी (GIFT City) इन दिनों मल्टीनेशनल कॉरपोरेशन्स (Multinational Corporations) के बीच काफी चर्चा में है। 100 से ज़्यादा ग्लोबल फर्में (Global Firms) यहाँ अपने ट्रेजरी फंक्शन्स (Treasury Functions) को सेंट्रलाइज करने के लिए पूछताछ कर रही हैं। JPMorgan Chase & Co. के मुताबिक, यह दिखाता है कि कंपनियां अब कई देशों में अपने कैश और लिक्विडिटी (Liquidity) की ज़रूरतों को मैनेज करने के लिए GIFT City को एक भरोसेमंद लोकेशन के तौर पर देख रही हैं।
क्या हैं GIFT City के खास आकर्षण?
GIFT City की सबसे बड़ी खूबी इसका रेगुलेटरी ढांचा (Regulatory Framework) है। यहाँ बिज़नेस फॉरेन-करेंसी और इंडियन रुपए, दोनों में अकाउंट खोल सकते हैं। यह सुविधा उन मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए बेहद ज़रूरी है जिन्हें क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट्स (Cross-border Payments), करेंसी रिस्क (Currency Risks) और इंटरनल फंडिंग (Internal Funding) को मैनेज करना होता है, वो भी दुबई या सिंगापुर जैसे पारंपरिक ऑफशोर सेंटर्स (Offshore Financial Centers) में अपने ऑपरेशन्स को शिफ्ट किए बिना। कंपनियों को लुभाने के लिए सरकार ने एक बड़ा इंसेंटिव (Incentive) भी दिया है - अप्रैल से शुरू हुई 20 साल की टैक्स हॉलिडे (Tax Holiday)। इन कदमों से यह ज़ोन दुनिया के दूसरे बड़े फाइनेंशियल हब (Financial Hubs) से मुकाबला करने में सक्षम हो रहा है।
ट्रेजरी सेंटर से कंपनियों को क्या फायदे?
बड़ी कॉर्पोरेशन्स के लिए ट्रेजरी सेंटर (Treasury Center) खोलना एक स्ट्रैटेजिक मूव (Strategic Move) होता है ताकि पैसे के मैनेजमेंट को ऑप्टिमाइज़ किया जा सके। कैश मैनेजमेंट को सेंट्रलाइज करने से कंपनियां फिजिकल पूलिंग (Physical Pooling) जैसे टूल्स का इस्तेमाल कर सकती हैं, जिसमें एक ब्रांच या सब्सिडियरी (Subsidiary) का सरप्लस कैश दूसरी की फंडिंग ज़रूरतों को पूरा कर सकता है। इससे बाहरी उधार लेने की ज़रूरत कम हो जाती है, और ब्याज की लागत (Interest Costs) में भारी बचत होती है, खासकर तब जब ग्लोबल कमोडिटी प्राइसेस (Global Commodity Prices) में उतार-चढ़ाव हो। JPMorgan ने बताया कि अभी जितनी फर्में पूछताछ कर रही हैं, वैसी पहले कभी नहीं देखी गई, जो दर्शाता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट (Infrastructure Development) अब कंपनियों का ध्यान खींच रहा है।
ज़ोन की बढ़ती बैंकिंग एक्टिविटी
इस बढ़ती दिलचस्पी का असर ज़ोन की बैंकिंग एक्टिविटी (Banking Activity) में भी दिख रहा है। सितंबर तक के दो सालों में बैंकिंग एसेट्स (Banking Assets) दोगुने होकर $100 बिलियन से ज़्यादा हो गए हैं। फिलहाल 10 कॉर्पोरेट ट्रेजरी सेंटर्स काम कर रहे हैं, और जो फर्में इस ज़ोन को इवैल्यूएट (Evaluate) कर रही हैं, उनमें सिर्फ बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां ही नहीं, बल्कि इंश्योरेंस फर्म्स (Insurance Firms) और फिनटेक प्लेयर्स (Fintech Players) भी शामिल हैं। इससे रीजन में ऑपरेट कर रहे बैंक्स के लिए लिक्विडिटी मैनेजमेंट और ऑटोमेटेड पेमेंट सॉल्यूशंस (Automated Payment Solutions) जैसी स्पेशलाइज्ड सर्विसेज (Specialized Services) देने का एक बड़ा मार्केट तैयार हो रहा है।
आगे क्या देखना होगा?
निवेशकों को यह देखना होगा कि आने वाली तिमाहियों में कितनी फर्में इन इंक्वायरीज़ (Inquiries) को ऑपरेशनल एंटिटीज़ (Operational Entities) में बदल पाती हैं। इस इनिशिएटिव (Initiative) की लॉन्ग-टर्म सफलता रेगुलेटरी कंप्लायंस (Regulatory Compliance) में आसानी, इंफ्रास्ट्रक्चर एक्सपेंशन (Infrastructure Expansion) की स्पीड और ज़ोन की टैक्स-एफिशिएंट स्टेटस (Tax-efficient Status) को बनाए रखने की क्षमता पर निर्भर करेगी। रेगुलेटर (Regulator) से ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी (Operational Flexibility) या अतिरिक्त सेक्टर-स्पेसिफिक इंसेंटिव्स (Sector-specific Incentives) को लेकर कोई भी नई पॉलिसी अनाउंसमेंट (Policy Announcement) भारत के फाइनेंशियल सर्विसेज सेक्टर (Financial Services Sector) की ग्रोथ पर नज़र रखने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण सिग्नल होगा।
