Noel Tata और उनके बेटे Neville Tata ने Sir Dorabji Tata Trust के अन्य ट्रस्टियों के खिलाफ मुंबई की अदालतों में लीगल केविएट (Caveat) दाखिल की है। यह कदम ट्रस्ट के भीतर चल रहे नेतृत्व और गवर्नेंस विवाद के बीच एक एहतियाती बचाव के रूप में देखा जा रहा है, जो Tata Group के भविष्य के फैसलों पर सवाल खड़े कर रहा है।
Noel Tata और उनके बेटे Neville Tata ने 7 अक्टूबर, 2026 को बॉम्बे हाई कोर्ट और मुंबई सिटी सिविल कोर्ट में कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी है। एक 'केविएट' का मतलब है कि अदालत अब बिना उनकी बात सुने कोई भी एकतरफा आदेश पारित नहीं कर पाएगी। इस कदम के जरिए टाटा परिवार ने Sir Dorabji Tata Trust (SDTT) के अन्य सदस्यों की ओर से आने वाली किसी भी अचानक कानूनी कार्रवाई के खिलाफ खुद को सुरक्षित कर लिया है।
कौन हैं निशाने पर?
इस कानूनी दस्तावेज में कई बड़े नामों को शामिल किया गया है, जिनमें Venu Srinivasan, Vijay Singh, Darius Khambata और Bhaskar Bhat शामिल हैं। यह पूरा विवाद उन ट्रस्टों के गवर्नेंस को लेकर है, जिनके पास Tata Sons की करीब 66% हिस्सेदारी है। टाटा संस ही पूरे टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी है, इसलिए यहाँ होने वाली उठापटक पूरे ग्रुप की दिशा तय करती है।
विवाद की जड़ क्या है?
असली झगड़ा Noel Tata के मौजूदा पद और 'परपेचुअल ट्रस्टी' के दर्जे की वैधता को लेकर है। 25 सितंबर, 2026 को Venu Srinivasan और Vijay Singh ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के पास शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें ट्रस्ट के अपॉइंटमेंट प्रोसेस पर सवाल उठाए गए हैं। फिलहाल चैरिटी कमिश्नर इस मामले की समीक्षा कर रहे हैं और सभी पक्षों को अपनी बात रखने के लिए 19 अक्टूबर, 2026 तक का समय दिया गया है।
निवेशकों के लिए जोखिम
बाजार के जानकारों का मानना है कि बोर्ड रूम की यह लड़ाई कॉरपोरेट गवर्नेंस पर नकारात्मक असर डाल सकती है। चूँकि ट्रस्ट ही टाटा समूह के मालिक हैं, इसलिए नेतृत्व में अनिश्चितता निवेशकों के भरोसे को प्रभावित कर सकती है। अब सबकी निगाहें 19 अक्टूबर की तारीख पर टिकी हैं, जो इस विवाद की अगली दिशा तय करेगी।
