विनिवेश की रणनीति
केंद्र सरकार एक बार फिर Hindustan Zinc Ltd. की ताकत का इस्तेमाल करने के लिए तैयार है. जुलाई तक 2% हिस्सेदारी बेचने की योजना है. डिपार्टमेंट ऑफ इन्वेस्टमेंट एंड पब्लिक एसेट मैनेजमेंट (DIPAM) इस डील को संभालेगा और इससे सरकारी खजाने में करीब ₹5,000 करोड़ आने की उम्मीद है. ICICI Securities, Axis Capital, IIFL Capital Services और HDFC Securities जैसे फाइनेंशियल एडवाइजर्स की मदद से सरकार कोल इंडिया और NHPC के विनिवेश की सफलता को दोहराना चाहती है.
बाज़ार की चाल और वैल्यूएशन
सरकार के नवंबर में ₹505 प्रति शेयर के भाव पर पिछली बार एग्जिट करने के बाद से Hindustan Zinc के शेयर का वैल्यूएशन काफी बढ़ा है. स्टॉक में करीब 24% का उछाल आया है, जो कि मेटल सेक्टर के प्रदर्शन के बराबर है. मौजूदा मार्केट कैपिटलाइज़ेशन लगभग ₹2.55 ट्रिलियन है और शेयर अपने अर्निंग्स का 18-19 गुना ट्रेड कर रहा है. इस बिक्री से सरकार पिछले सात महीनों में हुए वैल्यूएशन के विस्तार का फायदा उठाना चाहती है. कंपनी लगातार ज़िंक और सिल्वर की एक बड़ी ग्लोबल प्रोड्यूसर बनी हुई है.
जोखिम भरा पहलू
हालांकि विनिवेश का एक स्पष्ट वित्तीय तर्क है, लेकिन आसपास का माहौल कुछ जोखिम भी पेश करता है. कंपनी की पैरेंट कंपनी Vedanta Ltd. हाल ही में FEMA केस से जुड़े एक मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच के दायरे में आई थी. इससे गवर्नेंस को लेकर थोड़ी अनिश्चितता बढ़ी है, जो अक्सर इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स को डराती है. इसके अलावा, वेदांता ने हाल ही में अपने शेयरों पर लगी कुछ पाबंदियों को हटाया है, लेकिन ग्रुप पर भारी कर्ज होने का स्ट्रक्चरल दबाव बना हुआ है. बाज़ार विश्लेषक चेतावनी देते हैं कि इतने बड़े पैमाने पर किसी भी विनिवेश, खासकर ब्लॉक डील के ज़रिए, से थोड़े समय के लिए स्टॉक में वोलेटिलिटी आ सकती है. निवेशकों को 'रेगुलेटरी डिस्काउंट' की संभावना पर भी ध्यान देना चाहिए, क्योंकि पैरेंट कंपनी के वित्तीय मामलों की जांच, माइनिंग दिग्गज की अपनी ऑपरेटिंग ताकत पर भारी पड़ सकती है.
आगे का रास्ता
इस पेशकश की सफलता काफी हद तक ग्लोबल ज़िंक और सिल्वर की कीमतों की स्थिरता पर निर्भर करेगी, जो कंपनी की मुनाफेबाजी का मुख्य इंजन हैं. फाइनेंशियल ईयर 2026 में नेट प्रॉफिट ₹13,712 करोड़ रहा, जिससे पता चलता है कि कंपनी कैश जेनरेट करने वाली एक मजबूत इकाई है. हालांकि, बाज़ार इस बात पर नज़र रखेगा कि सरकार का यह कदम स्टॉक में गिरावट लाता है या फिर इंस्टीट्यूशनल बायर्स इस लिक्विडिटी को सोखकर मेटल एसेट्स में अपना एक्सपोज़र बढ़ाते हैं.
