15 अक्टूबर, 2026 से UPI के जरिए ₹2,000 से अधिक के ट्रांजैक्शन पर 0.4% मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू होगा। सरकार का कहना है कि यह डिजिटल पेमेंट सिस्टम को मजबूत करने के लिए जरूरी है, लेकिन 83% व्यापारी इस फैसले के खिलाफ हैं।
15 अक्टूबर, 2026 से डिजिटल पेमेंट का गणित बदलने वाला है। सरकार ने फैसला लिया है कि ₹2,000 से ज्यादा के चुनिंदा पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) ट्रांजैक्शन पर 0.4% का मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) वसूला जाएगा। इसका मकसद डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को फाइनेंशियली सस्टेनेबल बनाना है, लेकिन इसे लेकर बाजार में काफी हलचल है।
क्या है नया शुल्क ढांचा?
यह शुल्क केवल ₹2,000 से ऊपर की राशि पर लागू होगा, जबकि ₹75,000 से ऊपर के पेमेंट पर अधिकतम चार्ज ₹300 फिक्स किया गया है। आम लोगों को राहत देते हुए पर्सन-टू-पर्सन (P2P) ट्रांसफर को पूरी तरह फ्री रखा गया है। साथ ही, छोटे व्यापारी जो महीने में ₹1 लाख तक का कलेक्शन करते हैं, उन्हें भी इस दायरे से बाहर रखा गया है। हालांकि, रेलवे, फ्यूल और टेलीकॉम जैसे सेक्टर के लिए ₹5 का फ्लैट ट्रांजैक्शन चार्ज तय किया गया है।
व्यापारियों की नाराजगी और रिस्क
'LocalCircles' के सर्वे के मुताबिक, 83% व्यापारी इस 0.4% के खर्च को खुद उठाने को तैयार नहीं हैं। छोटे और मध्यम स्तर के कारोबारियों का कहना है कि उनके प्रॉफिट मार्जिन पहले ही बेहद कम हैं, ऐसे में यह कटौती उनके मुनाफे को सीधा प्रभावित करेगी। आशंका जताई जा रही है कि दुकानदार इस लागत को ग्राहकों पर डालने के लिए कीमतों में बदलाव कर सकते हैं या कैश पेमेंट को प्रमोट कर सकते हैं।
क्या UPI की रफ्तार धीमी होगी?
मार्केट एक्सपर्ट्स को डर है कि अगर मर्चेंट्स ने बड़े ट्रांजैक्शन के लिए UPI लेना बंद किया, तो ट्रांजैक्शन वॉल्यूम में कमी आ सकती है। वित्त मंत्रालय का कहना है कि इसका बोझ ग्राहकों पर नहीं पड़ना चाहिए, लेकिन फिलहाल इस पर कोई स्पष्ट जुर्माना या रिफंड मैकेनिज्म नहीं है। अब देखना यह है कि 15 अक्टूबर के बाद डिजिटल पेमेंट के प्रति व्यापारियों और ग्राहकों का रुख क्या रहता है।
