NSE डेरिवेटिव्स में 17% की गिरावट: RBI की नई फंडिंग गाइडलाइन्स का असर

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
NSE डेरिवेटिव्स में 17% की गिरावट: RBI की नई फंडिंग गाइडलाइन्स का असर

RBI की नई फंडिंग गाइडलाइन्स के कारण जुलाई में इंडिया के इंडेक्स डेरिवेटिव्स मार्केट में बड़ी गिरावट आई है। ट्रेडर्स और ब्रोकर्स के लिए क्रेडिट टाइट होने से इंडेक्स फ्यूचर्स का टर्नओवर 17% घटा है। निवेशकों को ध्यान देना चाहिए कि आने वाले महीनों में इस सख़्त नियम का पूरा असर दिख सकता है।

क्यों आई मार्केट में गिरावट?

भारतीय डेरिवेटिव्स मार्केट में जुलाई के महीने में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला। इसका मुख्य कारण है रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा कैपिटल मार्केट इंटरमीडियरीज के लिए जारी की गई संशोधित फंडिंग गाइडलाइन्स। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई में इंडेक्स फ्यूचर्स का टर्नओवर घटकर ₹3.96 लाख करोड़ रह गया, जो जून में ₹4.75 लाख करोड़ था। यह 17% की गिरावट है। वहीं, इंडेक्स ऑप्शन्स प्रीमियम टर्नओवर में भी 16% की कमी आई, जो पिछले महीने के ₹11.5 लाख करोड़ से घटकर ₹9.70 लाख करोड़ हो गया।

नई गाइडलाइन्स का सीधा असर

यह गिरावट सीधे तौर पर सेंट्रल बैंक के 1 जुलाई, 2026 से लागू हुए नए नियमों का नतीजा है। इन नए नियमों ने बैंक गारंटी के लिए कैश कोलेटरल की ज़रूरतों को बढ़ा दिया है और कुछ इंट्रा-डे क्रेडिट फैसिलिटीज पर रोक लगा दी है, जिनका इस्तेमाल पहले प्रोप्राइटरी ट्रेडर्स और ब्रोकर्स किया करते थे। इन क्रेडिट लाइन्स को सीमित करके, RBI ने इंडेक्स ट्रेडिंग के लिए मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए उपलब्ध लीवरेज (Leverage) को कम कर दिया है। हालांकि, NSE डेरिवेटिव्स का कुल टर्नओवर 2% ही गिरा है, जिसका एक कारण स्टॉक फ्यूचर्स और स्टॉक ऑप्शन्स वॉल्यूम में हुई बढ़ोतरी है। लेकिन, इंडेक्स-स्पेसिफिक एक्टिविटी में आई गिरावट नए लिक्विडिटी कंस्ट्रेंट्स (Liquidity Constraints) की सीधी प्रतिक्रिया है।

ट्रेडिंग वॉल्यूम पर धीरे-धीरे असर

मार्केट एनालिस्ट्स और इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि जुलाई के आंकड़े इन रेगुलेटरी बदलावों का पूरा असर नहीं दिखाते हैं। चूंकि 1 जुलाई की डेडलाइन से पहले ही कुछ फंडिंग फैसिलिटीज मौजूद थीं, इसलिए महीने के दौरान ट्रेडिंग एक्टिविटी को कुछ हद तक सहारा मिला। असली असर तब और स्पष्ट होने की उम्मीद है, जब ये पुरानी फैसिलिटीज खत्म हो जाएंगी और फर्म्स को सख़्त ज़रूरतों के तहत अपनी फाइनेंसिंग को रिन्यू करना होगा।

इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऑप्शन्स सेगमेंट, जहां प्रोप्राइटरी डेस्क ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण योगदानकर्ता रहे हैं, वहां और नरमी देखने को मिल सकती है। कुछ प्रोप्राइटरी फर्म्स हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग वॉल्यूम बनाए रखने के लिए इन क्रेडिट फैसिलिटीज पर निर्भर रही हैं, लेकिन इंडस्ट्री अब एडजस्टमेंट के दौर से गुजर रही है। जैसे-जैसे डोमेस्टिक प्रोप्राइटरी डेस्क अपनी स्ट्रेटेजीज़ को रीकैलिब्रेट (Recalibrate) करेंगे, मार्केट में पार्टिसिपेशन में बदलाव आ सकता है। कुछ जानकारों का सुझाव है कि डोमेस्टिक डेस्क द्वारा छोड़ी गई खाली जगह को फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) या ग्लोबल ट्रेडिंग फर्म्स भर सकती हैं, जिनके पास कैपिटल के अलग स्रोत होते हैं। ऐतिहासिक रूप से, भारतीय डेरिवेटिव्स मार्केट ने रेगुलेटरी एडजस्टमेंट्स के प्रति रेजिलिएंस (Resilience) दिखाया है, और पार्टिसिपेंट्स के नए नॉर्म्स को अपनाने के साथ वॉल्यूम में सामान्यीकरण अक्सर देखा गया है। निवेशकों के लिए, आने वाले महीनों में मुख्य बात यह होगी कि मार्केट लिक्विडिटी स्थिर रहती है या कैपिटल की बढ़ी हुई लागत इंडेक्स-आधारित प्रोडक्ट्स में पार्टिसिपेशन पर दबाव डालती रहती है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.