RBI की नई करेंसी स्वैप सुविधा के दम पर अप्रैल से जुलाई के बीच NRI डिपॉजिट्स **678%** बढ़कर **$36.24 बिलियन** पर पहुंच गए हैं। वहीं, LRS के जरिए विदेश पैसा भेजने वाले भारतीयों का रुझान अब एजुकेशन और ट्रैवल से हटकर ग्लोबल इन्वेस्टमेंट की ओर बढ़ रहा है।
बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी की लहर
जून में RBI द्वारा लाई गई स्पेशल कंसेशनल स्वैप फैसिलिटी का असर बैंकों की बैलेंस शीट पर साफ दिख रहा है। इस सुविधा के चलते बैंकों ने बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा जुटाने में सफलता पाई है। आंकड़े बताते हैं कि 31 अगस्त तक बैंक कुल $133 बिलियन मोबिलाइज कर चुके हैं। इसका सीधा असर यह हुआ कि जुलाई के अंत तक कुल आउटस्टैंडिंग NRI डिपॉजिट्स बढ़कर $200.89 बिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं।
कैसे बदल रही है भारतीयों की निवेश सोच?
जहां बैंकिंग सेक्टर में डॉलर की बारिश हो रही है, वहीं लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत पैसा भेजने वाले आम भारतीयों की पसंद पूरी तरह बदल गई है। इस फाइनेंशियल ईयर के शुरुआती 4 महीनों में कुल आउटपुट 4.7% बढ़कर $9.37 बिलियन रहा है। लेकिन इस डेटा के पीछे एक गहरा बदलाव छुपा है।
भारतीयों ने अब विदेशी जमीन पर पैसा खर्च करने का तरीका बदल दिया है। ओवरसीज इक्विटी और डेट में किया जाने वाला निवेश दोगुना होकर $1.4 बिलियन के स्तर पर पहुंच गया है।
एजुकेशन और ट्रैवल पर गिरी गाज
निवेश की होड़ के बीच पारंपरिक खर्चों में भारी कटौती देखने को मिली है:
- विदेशी शिक्षा (Overseas Education): इसमें साल-दर-साल 30.6% की भारी गिरावट आई है, जो घटकर $472.66 मिलियन रह गया है।
- अंतरराष्ट्रीय यात्रा (International Travel): इसमें भी 1.31% की मामूली कमी दर्ज की गई है।
यह ट्रेंड साफ इशारा करता है कि अब भारतीय परिवार अपनी बचत को केवल सर्विस खर्चों में नहीं, बल्कि ग्लोबल एसेट क्रिएशन में लगाने को प्राथमिकता दे रहे हैं। निवेशकों के लिए यह एक संकेत है कि वे अब अपने पोर्टफोलियो में ग्लोबल डायवर्सिफिकेशन को लेकर ज्यादा आक्रामक हो रहे हैं, जो भविष्य के लॉन्ग-टर्म कैपिटल आउटफ्लो पैटर्न को बदल सकता है।
