National Payments Corporation of India (NPCI) ने खुलासा किया है कि UPI की सर्विस देने के चक्कर में भारतीय बैंकों पर हर साल **₹21,000 करोड़** का खर्च आ रहा है। जीरो-फी मॉडल और बढ़ती टेक्नोलॉजी लागत के बीच बैंकों के मार्जिन पर दबाव बढ़ रहा है।
UPI ने भले ही देश में डिजिटल क्रांति ला दी हो, लेकिन बैंकों के लिए यह अब एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। NPCI के अनुसार, इस पूरे इकोसिस्टम को चलाने के लिए बैंकों को हर साल ₹21,000 करोड़ खर्च करने पड़ रहे हैं। जैसे-जैसे ट्रांजैक्शन की संख्या बढ़ रही है, बैंकों पर यह ऑपरेशनल बोझ भी लगातार बढ़ता जा रहा है।\n\n### टेक्नोलॉजी का बढ़ता खर्च\n\nNPCI के हेड दिलीप अस्बे (Dilip Asbe) के मुताबिक, इसका सबसे बड़ा कारण सर्वर क्षमता और टेक्नोलॉजी पर होने वाला भारी खर्च है। हार्डवेयर की कीमतें आसमान छू रही हैं। उन्होंने बताया कि जो सर्वर यूनिट पहले ₹20 लाख में मिलती थी, अब उसकी कीमत बढ़कर ₹1 करोड़ तक पहुंच गई है, जिससे बैंकों के बजट पर सीधा असर पड़ रहा है।\n\n### State Bank of India पर सबसे ज्यादा मार\n\nइस भारी-भरकम खर्च का बड़ा हिस्सा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) जैसे बड़े बैंकों को उठाना पड़ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, SBI अकेले UPI इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए हर साल ₹2,000 करोड़ से ₹3,000 करोड़ खर्च कर रहा है। दिक्कत यह है कि 'जीरो-मर्चेंट डिस्काउंट रेट' (MDR) पॉलिसी के कारण बैंक मर्चेंट्स से कोई फीस नहीं ले सकते, जिससे यह लागत पूरी तरह बैंकों की जेब से जा रही है।\n\n### मुनाफे पर दबाव और आगे का रास्ता\n\nबैंकों को केवल सर्वर का ही नहीं, बल्कि हर ट्रांजैक्शन पर भेजे जाने वाले अनिवार्य अलर्ट मैसेज का खर्च भी उठाना पड़ रहा है। अब निवेशक और रेगुलेटर इस बात पर नजर गड़ाए हुए हैं कि क्या भविष्य में मर्चेंट फीस या कॉस्ट-शेयरिंग को लेकर कोई नया नियम आता है। फिलहाल, यह जीरो-फी मॉडल बैंकों के लिए काफी महंगा साबित हो रहा है, जो आने वाले समय में बैंकिंग सेक्टर के मार्जिन के लिए एक बड़ा 'टॉकिंग पॉइंट' बना रहेगा।
