NPCI अब उन बड़े मर्चेंट्स के लिए Merchant Discount Rate (MDR) लागू करने पर विचार कर रहा है जिनका सालाना बिजनेस **₹1,000 करोड़** से ज्यादा है। इस कदम का मकसद डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का खर्च निकालना है, जबकि छोटे दुकानदारों और आम ग्राहकों के लिए यूपीआई सेवा पूरी तरह फ्री बनी रहेगी।
जीरो-MDR मॉडल में बदलाव का संकेत
नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने अपनी UPI रणनीति में बड़ा बदलाव करने का संकेत दिया है। CEO दिलीप अस्बे ने साफ किया है कि संस्था एक ऐसे MDR फ्रेमवर्क पर काम कर रही है, जो सिर्फ बड़ी कंपनियों पर लागू होगा। अब तक UPI 'जीरो-MDR' मॉडल पर चल रहा था, जिसका पूरा बोझ बैंक और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स उठा रहे थे, लेकिन अब इसे बदलने की जरूरत महसूस की जा रही है।
किन पर होगा असर?
यह नया नियम सभी के लिए नहीं है। डेटा के मुताबिक, कुल संभावित फीस रेवेन्यू का 80% हिस्सा उन बड़ी कंपनियों से आता है जिनका एनुअल ग्रॉस मर्चेंट वैल्यू (GMV) ₹1,000 करोड़ के पार है। ये बड़ी कंपनियां पहले से ही क्रेडिट कार्ड ट्रांजैक्शन के लिए फीस देती आई हैं। दूसरी तरफ, 75% छोटे व्यापारी, जिनका ट्रांजैक्शन ₹2,000 से कम रहता है, उन्हें इस बदलाव से पूरी तरह दूर रखा जाएगा।
बैंकों के लिए 'मोनेटाइजेशन' का मौका
निवेशकों के नजरिए से यह एक अहम खबर है। लंबे समय से बैंक और पेमेंट एग्रीगेटर्स मांग कर रहे थे कि डिजिटल नेटवर्क बनाने और उसे सुरक्षित रखने का खर्च वसूलने का कोई जरिया होना चाहिए। अगर यह MDR फ्रेमवर्क लागू होता है, तो बैंकों और पेमेंट कंपनियों की 'फी-बेस्ड इनकम' में सुधार हो सकता है। हालांकि, बाजार की इस पर प्रतिक्रिया क्या होगी, यह देखना दिलचस्प होगा।
AI के साथ भविष्य की प्लानिंग
कीमतों के बदलाव के अलावा, NPCI अब 'एजेंटिक पेमेंट्स' (Agentic Payments) लाने की तैयारी में है। यह AI पर आधारित सिस्टम होगा जो पेमेंट को खुद-ब-खुद (Autonomous) पूरा कर सकेगा। इससे UPI के उपयोग के नए रास्ते खुलेंगे, लेकिन निवेशकों की नजर इस पर होगी कि कंपनी कैसे अपनी तकनीक पर खर्च और प्लेटफॉर्म की कॉम्पिटिटिवनेस के बीच तालमेल बिठाती है।
